कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर नाईसे कहा कि, इन पाँचोंमेंसे जिसको चाहे तू काट ले । यह व्यवस्था देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया और आपका खुतनः नहीं हुआ ।
तेतालीसवाँ प्रकरण ।
कुरबानी ।
एकबार आप छोटे छोटे बच्चोंके साथ खेल रहे थे, उस समय काजीने गायकी कुरबानीका प्रबंध किया—जिस समय गऊको जबह करने लगे । उस समय कबीर साहबने, जो बालकोंके साथ खेल रहे थे जान लिया कि, काछी गौके जबह करनेको तय्यार हैं—तब आप तुरन्त बालकोंके साथका खेलना छोड़कर गौकी ओर दौड़े । जब तक, आप गायके समीप पहुँचे तबतक तो काजीने गऊको समाप्त कर दिया । कबीर उसाहब आकर उस काजीको अनेक उपदेश देके अत्यन्त धिक्कारा और लज्जित किया तब यह काजी लजाकर अपने अपराधके निमित्त क्षमाका प्रार्थी हुआ । फिर आपने उस गऊको जीवित कर दिया और आप अन्तर्धान होगये । प्रमाण बृहंतकबीरकसौटी—
कबीर साहबकी सुन्नतका । (बृ. क. कसौटी)
एक तो नीरूके घर सिद्ध बालकको देखकर उसकी प्रसिद्धीसे लोग जलते थे । दूसरेही मांसाहारी मुसलमानोंके विरुद्ध नीरूने सदाके लिये मत्स्य-मांसको अपने घरमें न लानेकी प्रतिज्ञा करली थी । इससे मूर्ख मुसलमानोंने उसे अपने धर्मसे भ्रष्ट होते समझकर उसे सुधारनेकी फिक्र करना आरम्भ किया—
काशीके जोहलन मिली, आनि कियो परपंच ।
सबै कहैं नीरू तुम, क्या बैठे निश्चिन्त ? ॥
बेटेकी तुम सुन्नति कराओ । पंचोंका तुम हाथ धुलाओ ॥
काछी मुलनाको बुलवाओ । गैनी^१^ और शराब मँगाओ ॥
इस प्रकारकी उनकी बात सुनकर नीरूने कानपर हाथ रखकर कहा—
नीरू कहै सुन्नति करवाओं । पै नहिं गैनी गला कटाओं ॥
तब उसके जाति विरादरीबालोंने उससे क्रोध करके कहा—
जोलहा सब तब कहैं रिसाई । क्या नीरू तुम अकिल गवाईं ॥
अपने कुलकी रीति न छाड़ो । कुल परिवार करिहैं सब भांडो ॥