कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहबके गुप्त हो जानेका वृत्तान्त ग्रन्थमें मैंने ग्रन्थ कबीरभानु-प्रकाशमें लिखा है उसको इस ग्रन्थसे मिलाकर शुद्ध करलेना उचित है। यह ग्रंथ भली भाँति शुद्ध करके लिखा गया है।
शञ्जल।
खुरशेद परस्व परतव मादूम हुआ है। इन्सान खबर खैर से महकूम हुआ है ॥ आई जो खिजां और गया वक्त बहारी। बुलबुल सुजरा जाए नशीं बूम हुआ है ॥ है कौन जहां में जो मिटा डाले वह तस्तीर। जो कुछ कि कजा काजी से मरकूम हुआ है। तकदीर वयक नायः बिठाला है दो महमल। एक नेकनुमा दूसरा बदशूम हुआ है ॥ वाको न रहे और कहीं शम्स शोभाय। अफवाज लिये तब महे मालूम हुआ है ॥ पा खाक तेरेसै धरा एक जरः सर अपने। सो रहम दो दारैन का मौसूम हुआ है। जो जहर मो अस्सर बहमःसालिको मसलूक। हंर इन्स व जिन उससेही मसमूम हुआ है ॥ आई शब्र और पुष्ट दिखाया। शहे आदल। रैयत जमाः जम जोरसे मजलूम हुआ है ॥ इस अहदमें कोई न सुन मर्दूम फरियाद। मखलूक मलिक मौत का महकूम हुआ है ॥ है मौतका चारः आदम जाद विचारः। अज रोंजे अजल उसकेही मकसूम हुआ है ॥ क्या कह सके तुझसे न कहा जाय सो आजिज। जो कुछ कि तुझे गैब से मफहूम हुआ है।
अध्याय ॥ ५ ॥
कबीरपन्थके धार्मिक नियम।
१—एक अविगत अतीत ब्रह्म सत्य पुरुषका भक्त हो, उसके अतिरिक्त किसी ओर भी ध्यान न करे।
वह ब्रह्म (सत्य पुरुष) केवल पारख गुरुकी शिक्षा एवं स्वसंबेदके अध्ययन (पढ़ने) से जाना जाता है। दूसरा कोईभी मार्ग उसकी प्राप्तिका नहीं है।
२—सत्य पुरुष और कबीर साहब एकही हैं; केवल नाममात्रकाही भेद है। वे एकही दो नामसे कहे जाते हैं उनमें लेशमात्र भी भेद नहीं समझे जो भेद समझेगा उसका मुक्ति होने में भी अवश्य भेद रहेगा।
३—गुरुकी सेवा तन, मन, धनसे करे। गुरु वचनका विश्वास करे। गुरुका आज्ञाकारी रहे। सत्य कबीर और गुरुमें कुछ भी भेद न समझे, गुरुके ऐश्वर्य्य सिद्धि आदिका विचार न करे। जो अपने गुरुको ईश्वर करके