कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमानता है, ईश्वरके समानही उसमें भक्ति रखता है उसीका कार्य पूर्ण होता है; पर जो गुरुमें भेदबुद्धि करता है, वह हत भाग्य सदा निष्फलताही प्राप्त करता है ।
अपने उपाजनका दशवों भाग अवश्य गुरुको भेंट करे । सदा अधीनतासे गुरुका धन्यवाद करता रहे ।
४—साधुकी सेवा, भेदबुद्धि त्यागकर, सदा प्रेम और भक्तिसे करे जिस पर संत गुरुकी दया होती है वही दोनों लोकोंमें भाग्यवान होता है । वही दोनों लोकोंमें सफल मनोरथ होता है ।
सर्व प्रकारके साधुओंकी सेवा निष्कपट हृदयसे करना परन्तु ज्ञानी विचारवान्, विवेकी पारखी संत जो सत्य पुरुषकी भक्तिका उपदेश करें, सदाचरणमें लगावें, उनकी सेवामें सदा तत्पर रहे । विशेषतः स्वधर्मके सच्चे विवेकी संतोंकी शिक्षाको सावधानीसे सुने, उनको ध्यानपूर्वक विचारें क्योंकि, स्वधर्ममें पूर्व दृढ़, संतोंके वचनसे धर्ममें दृढ़ आस्था एवं स्वधर्मप्रायणता होती है । इसके उलटा परधर्म (विपक्षीधर्म) के पक्षपाती साधुओंके वचनसे स्वधर्ममें अश्रद्धा और भ्रम होता है ।
जिस साधुमें अपने गुरुसे मिलते हुये गुण पाये जायें उनको अपने गुरुसे भिन्न न समझे, अभेदबुद्धिसे श्रद्धापूर्वक निष्कपट भक्ति करे ।
५—सर्व चराचर जीवधारियोंपर समान भावसे दया रखे । किसी स्वरूप आकारमें कोई भी जीवधारी हों, सबको अपने शरीर और आत्मामें समान जानें । किसी देश कालमें भी किसी जीवधारीको दुख न दे । संसारमें अपना निर्वाह इस प्रकार करे कि, कभी भी अपनी ओरसे किसी जीवधारीको किसी प्रकारकी हानि न पहुँचे । सब जलचर, थलचर, वनवर, पशु-पक्षी स्थावर, जंगमपर समान दयादृष्टि रखे, सबको अपनेही शरीर और प्राणके समान समझे ।
६—मांस आहारको सब घोर पापोंमें बड़ा पाप समझे ।
मांस अहारी चाहे कैसे भी गुण और पुण्यसे पूर्ण क्यों न हों पर कभी भी वह सत्य मार्गको प्राप्त नहीं कर सकते, मांसाहारी आत्मज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकते, उसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती ।
७—मदिरा तथा अन्य सब मादक पदार्थभी मांसके समानही छोड़ने चाहिये । कोई मादक पदार्थका व्यसनी ध्यान नहीं कर सकते, ध्यान बिना ज्ञान-प्राप्त नहीं होता, ज्ञान बिना मोक्ष नहीं मिलता ।