कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ें८—व्यभिचारीको नर्क निश्चय ही होता है ।
९—जितने आकार रूप ब्रह्माण्डमें हैं वे सब बुत कहलाते हैं उनमेंसे रूप या नाम किसीको भी पूजनेवाला मोक्षका अधिकारी नहीं हो सकता । जिस प्रकार बुतपरस्ती ज्ञान मार्गकी टट्टी है, उसी तरह ईश्वर गुरुमूर्तिके ध्यान भक्ति, द्वारकी कुंजी हैं ।
१०—जो कुछ, भोजन, छाजन आदि अपनी संसार यात्रा सम्बन्धी पदार्थ हों, वे सब प्रथम परमात्मा (सत्य पुरुष) को अर्पण कर ले तब स्वयम् स्वीकार करे ।
कोई भी पदार्थ जो प्रथम किसी देवी देवताको अर्पण हो चुका हो, उसे सत्य पुरुषकी भक्ति करनेवालेको कदापि ग्रहण न करना चाहिये, क्योंकि, सत्य पुरुषको अर्पण किये बिना किसी भी पदार्थको ग्रहण करना महापाप है जो पदार्थ दूसरे देवी, देवताको भोग लग गया वह सत्य-पुरुषको अर्पण हो नहीं सकता क्योंकि, दूसरे देवका अर्पित पदार्थ, सत्य-पुरुषको अर्पण करना एक तुच्छ सेवकके जूठे पदार्थको बादशाहको अर्पण करनेके तुल्य महान् अपराध एवम् अनर्थका करनेवाला है ।
कभी भी सत्यपुरुषको भोग लगाये बिना कोई पदार्थ ग्रहण न करे । जो सत्यपुरुषको अर्पण करके किसी पदार्थको ग्रहण करता है, उसका फल अमृत समान मिलता है । इसलिये उचित है कि, अत्यन्त शुद्ध और स्वच्छ भोजन आदि काममें लावे ।
११—न झूठ बोले एवं न झूठे वचन दे, न झूठेका संगही करे । न झूठेसे किसी प्रकारका व्यवहार करे ।
१२—चोरी करना, चोरोंका साथ देना, उनकी सम्मतिमें सहमत होना, उनको सम्मति देना, उनका माल लेना और उनके निकट न जाना चाहिये ।
१३—जूआ न खेले क्योंकि, जूआ महान् दुःखका घर है जूआरियोंकी महा-दुर्दशा होती है । महाराजा नल, महाराजा युधिष्ठिर आदि पुण्यस्वरूप धर्मावतारोंको भी इस जूआने कँसा नष्ट और दुर्दशा ग्रसित कर दिया था जूआ, झूठ, चोरी, व्यभिचार और हिंसा आदि सब पाप परस्पर संबंध रखते हैं, एक दोष आनेसेही क्रमशः सर्व आपही आप आ जाते हैं । इनमेंसे किसी भी एकको धारण करनेवाले पुरुष महान् दुःखोंका अनुभव करते हुये परलोकमें नर्कके भागी होते हैं ।