भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 333

१४—शरीरके ऊपर द्वादश तिलक लगावे । कपालमें खड़ी लकीरके समान सीधा तिलक करे, वैसेही मस्तक दोनों ओँख, नाभि, हृदय, दोनों भुजा और दोनों छातियोंसे लेकर मोढेकी ओर फिरता हुआ, पीठ और कानपर तिलक करे ।

१५—उज्वल वस्त्र श्वेत रखे ।

१६—ग्रीवामें तुलसीकी माला एवं तुलसीकी कंठी धारण करे ।

१७—सत्यनामका जप, कीर्तन और भजन करता रहे ।

१८—सत्यपुरुषकी भक्ति तथा सत्यपंथका उपदेश करे । एक मनुष्यको सत्यपुरुषकी भक्ति और सत्यपंथमें प्रवेश करानेके फल करोड़ों गऊओंको कसाईके हाथसे बचानेके पुण्यसेभी बढ़कर है ।

१९—यंत्र, मंत्र, तंत्रादिकी ओर कभी ध्यान भी न दे क्योंकि, ये मुक्ति और भक्तिके शत्रु हैं । इनका साधन करनेवाला छल कपटके व्यसनमें फँसकर महादुराचारी हो नर्कका अधिकारी हो जाता है । जितने तंत्रादिक साधन हैं सब नर्ककेही मार्ग हैं ।

२०—स्वसंबेदके बिना दूसरी पुस्तकोंसे मुक्ति पथ मिलनेकी आशा न रखना चाहिये परन्तु अन्य पुस्तकोंका बोध और ज्ञान बृद्धिके हेतु पढ़े ।

२१—सत्य कबीर और उनके सच्चे हंस और कंडिहारके बिना दूसरेको मुक्तिपथका दर्शन नहीं समझे ।

२२—पारख गुरुकी शिक्षा बिना कदापि मुक्ति नहीं होती ।

२३—सत्य पुरुषकी भक्तिके बिना अन्य सब भक्तियाँ भवसागरमें डुबानेवाली हैं ।

२४—सकाम तीर्थ व्रत आदि सब यमके बन्धन हैं ।

२५—सकाम नौधाभक्ति और चार प्रकारकी मुक्तिकी चाह सब बन्धनही हैं ।

२६—कामी निर्गुण और सगुणके ध्यान करनेवाले भी हों बंधनमेंही रहते हैं ।

२७—हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सब जाति और धर्मके लोग कबीर पंथमें मिल सकते हैं, सबके हेतु समानही भक्ति और मुक्ति है ।

१ यंत्र मंत्र तंत्रका आशय, देखो पण्डित श्रद्धाराम फिल्लोरी विरचित सत्यामृत प्रवाह पृष्ठ १८० में ।

२ वेदादि विद्या सब, बोध हेतु हिय धार ॥ सब मत महरम करे, तब देखे निज सैन ॥

३ कबीर— हम वासी वहि देशके, जहाँ जाति वरण कुल नाहि ।

शब्द मिलावा होय रहा, देह मिलावा नाहि ॥

जाकी मर्यादा जौन विधि, बरते सोई प्रमान ।

जमा माँहि कछु भेद नहि, उज्वल धर्मओ ज्ञान ॥ ६