कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंलादली । जब चलते २ अपने गुरुद्वारे पहुँच कर डेरा डाला तब भोजन प्रस्तुत हुवा, रामानुज स्वामीके जो आचार्य हैं वे स्नानादिका बहुत ध्यान रखते हैं । पडदा करके अपने हाथसे भोजन बनाकर भोजन करते हैं । यदि किसी शूद्रकी छाया भोजनपर पड जावे तो वे उसको नहीं खाते, उन लोगोमें जातीय ध्यान भी विशेष है । प्रायः वे जातिके ब्राह्मण होते हैं, तथा अन्य जातिके मनुष्योंकी भी उनमें संख्या है । उन लोगोका मुख्य अभिप्राय यही था कि, कबीर साहब वेदपाठी नहीं है—इस बहानेसे हम अपनी पंक्तिमें कबीर साहबको न बैठावेंगे उन्हींने पूछा कि, कबीर साहबको अपने बराबरमें बैठकर भोजन करावें परन्तु अपने झुंडसे पृथक् बैठवें किन्तु पृथक् बैठ लेना भी उचित न समझा । अतएव उन्हींने एक बहाना निकालकर कहा कि, जो कोई वेदकी ऋचा पढ़े वह हमारे साथ बैठकर भोजन करे, जिसको वेद पाठ न आवे वह हमारी पंक्तिमें न बैठे । सबोंने वेदका कोई २ विशेष भाग पढ़ पढकर सुना दिया—जब कबीर साहबकी बारी आई तब कबीर साहबने भैसेके शीशपर हाथ धरकर कहा कि, ए भैसे ! तू वेद पढ़ । तब वह भैंसा अत्यंत स्वच्छता और स्वरके साथ वेद पढ़ने लगा । जब उस भैसेको वेद पढ़ते देखा तब समस्त आचारियोंने कबीर साहबके चरणोंपर गिर कर अपना अपराध क्षमा कराया । यह बात दक्षिणके आचारियों तथा वैरागियोंमें विख्यात है । अनेक साधुगण इस लीलाको जानते हैं कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते हैं ।
कबीर साहब तथा रविदासजीसे वाद विवाद हुवा । तब रविदासजी का पक्षपात करनेके निमित्त देवी तथा ब्रह्मा विष्णु शिव सब आए । कबीर साहबने सबको परास्त कर दिया । चारोंका क्रोध तथा झल्लाहट किसी काम न आया । देवी और शिवने अत्यंत क्रोध किया । देखो कबीर साहब और रविदास गोष्ठी ।
जहाँगशतशाह एक सिद्ध साधु था । वह समस्त पृथ्वीकी सैर किया करता था । उससे साधुओंने पूछा कि, तुमने कभी कबीर साहबका दर्शन किया, क्या वह बड़े प्रतिष्ठित हैं । तब जहाँगशतशाह काशीको चले । कबीर साहबने जान लिया कि, मेरे साक्षात्के निमित्त जहाँगशतशाह आते हैं । कबीर साहबने एक सूबर मँगवाकर अपने द्वारपर बँधवा दिया । जहाँगशतने दूरसे देखा कि, द्वारपर सूबर बँधा हुआ था, बड़े क्रुद्ध हुए और झल्लाकर पलट पड़े । तब कबीर साहबने पुकारा कि, ए जहाँगशत ! क्यों पलटे जाते हो ? मेरे समीप आओ । इतनी बात सुनकर जहाँगशतने मालूम कर लिया कि, कबीर साहबने जान लिया ।