भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342

मुझको पहिचान लिया। उनके मनमें निश्चय हो गया कि, कबीर साहब कोई सिद्ध तथा श्रेष्ठ पुरुष हैं। वहाँसे पलटे और कबीर साहबके पास आकर कहने लगे कि, मैंने सुना था कि, कबीर साहब बड़े सिद्ध हैं, इस कारण मैं आपका साक्षात् करने आया था। अपने द्वारपर हराम बाँध रक्खा है—यह कैसी घृणित बात है? यह बात सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया कि, ऐ जहाँगशत-शाह! मैंने हरामको अपने गृहके बाहर बाँध दिया है मेरे भीतर तनिक भी नहीं रहा—आपने हरामको अपने भीतर बाँध रक्खा है। फिर बाहर निकाल देना अच्छा कि, भीतर बाँध रखना? क्योंकि, क्रोध अहंकार भद आदि सब हराम हैं, वे तुम्हारे भीतर हैं। जिसको तुमने हराम समझा हैं—वह हराम नहीं, बरन् क्रोध हराम हैं। इस शिक्षासे जहाँगशतशाह प्रसन्न हो गए—संध्याका समय निकट आया जहाँगशतशाहने इच्छा प्रगट की कि, मैं भवकाममें निभाज पढ़ना चाहता हूँ। कबीर साहबने एक पलभरमें भवका पहुँचा दिया। जिन सिद्धोंके बीच जहाँगशतसे जाया न जाय वहाँभी कबीर साहबने उनको पहुँचाया—तब जहाँगशत अधीन हुए।

रामदास नामक एक धनाढ्य जागीरदार ब्राह्मण था वह दक्षिण देशमें नर्मदा नदीके किनारे रहता था। स्नान करनेके लिये गया तो वहाँ उसे कबीर साहब बैठे मिले। उसने उनसे निवेदन किया कि, महाराज! आप समर्थ हो, मुझको विष्णुका दर्शन कराओ, तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, कल दोपहरको विष्णु तुम्हारे घरपर जावेंगे। यह बात सुनकर रामदासको निश्चय हो गया कि, कबीर साहबका बचन हो गया है अब कल मेरे घर अवश्यही विष्णु आवेंगे। तब उसने अपने घर जाकर बड़ी तैयारी की। दूसरे दिवस गृहको भली-भाँति स्वच्छ और पवित्र करा बिछौने इत्यादि बिछवाए। नाना प्रकारके स्वादिष्ट भोजन बनवाये। सिंहासन इत्यादि प्रस्तुत कराए। प्रतीक्षा करते हुए बैठे कि, अब विष्णुमहाराज आया चाहते हैं तो कुछ कालके उपरान्त देखा कि, एक भँसा कीचड़से लतपत होकर आया और उस फर्शके ऊपर बैठ गया। रामदासको अत्यंत क्रोध आया कि, इस भँसेने फर्शको बिगाड़ दिया। सोटा लेकर इस भँसेको मार भगाया। उस भँसेको भगाकर फिर विष्णुके आनेकी प्रतीक्षा करने लगे। समस्त दिवस व्यतीत हो गया पर कोई नहीं आया। वह ब्राह्मण निराश हुवा। प्रातःकाल नदी स्नानके निमित्त गया। फिर उसी स्थानपर कबीरको बैठो देखकर कहा कि, महाराज! मुझको विष्णु महाराजका दर्शन तो न हुवा!