भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 450

भीतरके अन्धे ।

जितने विद्वान् हैं सब विषयानन्दी भीतरी प्रकाशसे अन्धे हैं । ये अन्धे यथार्थ तात्पर्य तो समझ नहीं सकते । अपढ़ों तथा अपनेसे कम पढ़ोंको भटकाते हैं, इस कारण अपढ़ तथा कम पढ़े हुवे साधुओंकी शिक्षा मान लेते हैं । जो कुछ अधिक पढ़े हैं वे अपनी धूर्तता तथा चालाकी किये बिना नहीं रहते । इस कारण साधु लोग उनको शिक्षा नहीं देते । कारण यह कि, वे साधु जो पहुँचे हुये हैं उनके सामने अरस्तू और अफलातून इत्यादि ऐसे हैं जैसे किसी विद्वान्के समक्ष एक हलवाहा हो । पहुँचे हुवोंकी शिक्षा पर विद्वानोंका खण्डन मण्डन ऐसीही बात है जैसे कि हलवाहा, लुकमान तथा सुकरात आदिको शिष्य बनाना चाहता है । पण्डितों तथा विद्वानोंकी क्या सामर्थ्य है पहुँचेहुवोंकी शिक्षाको काट सकें ? पहुँचेहुवोंसे बढ़कर ब्रह्मज्ञानी है ब्रह्मज्ञानीसे बढ़कर विज्ञानहंस है । जो पूर्ण विज्ञानहंस हो उसकी सबपर श्रेष्ठता है । जो जो ऋषि मुनि हुए तथा अब वर्तमान हैं और वे लोग जितना प्रकाश बन्दना पूजाका रखते हैं । ज्ञानकी जिस सीमापर अधिकृत हैं, विद्वानोंसे उनकी श्रेणी सम्यक् प्रकारसे बढ़कर है । साधनाके प्रकाश बिना, केवल पुस्तकपाठसे आत्मिक प्रकाश प्राप्त कर नहीं सकता । विद्वानोंके हृदय खण्डन मण्डन तथा घमण्डसे भरे होते हैं । इस कारण साधुलोग हलवाहेको लेखनीधारीसे अच्छा समझते हैं । कारण यह कि, हलवाहा तो सेवा स्वीकार करता है । पढ़े लिखोंसे यह बात नहीं होती ।

कालपुरुष किससे डरता है ?

ऐसेही मूसः तो नाममात्रको थे कालपुरुषने सबको परदेसे मारकर गर्दमें मिला दिया । काल तथा उसके समस्त पुत्र समस्त संसारके प्रबन्धक हैं । जैसी उनकी इच्छा होती है किया करते हैं । इस कालपुरुषके राज्यमें बिना कबीर साहबके दूसरेका वश नहीं है कि, बाधा दे सके कारण यह कि, कालपुरुषसे प्रबल अन्य कोई नहीं । केवल कबीर साहबसे वह भयभीत होता है, दूसरा कोई नहीं ; केवल कबीर साहबसे वह डरता है और दूसरा कोई उसका सामना कर नहीं सकता । न उसको अधीन कर सकता है । कौन है जो उसको दबा सके एकभी नहीं । सब इससे भागते तथा दबते हैं । यह बड़ा बलिष्ठ है ।

माया ।

यह समस्त संसार मायापूजक है । जैसे मदिरा पीकर जब मनुष्य अचेत होता है तब मदिराकोही जल समझता है उसको तनिक भी सुध नहीं रहती । इसी प्रकार यह समस्त संसार अज्ञान और विषयोंके आनन्दमें मग्न हो रहा है ।