भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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यह समस्त अवस्था जीवके बंधनके निमित्त ठहराई हैं । जबतक इन अवस्थाओंमें रहेगा तबतक बराबर फँसा रहेगा । कर्म, उपासना, योग और ज्ञान इत्यादि सब आज्ञानावस्थामें कर रहा है । जितने उसके कर्म धर्म हैं सब अचेतनावस्थाके कृत्य हैं । यह मनुष्य अपनी मुक्तिकी सहस्रों युक्तियाँ करता है । पर कोई सूरत छुटकारेकी दिखाई नहीं देती । मिथ्याको सत्य और सत्यको मिथ्या जान रहा है । अपने व्यर्थके विचारोंको सत्य तथा ठीक मान रहा है । कितने पीर पैगम्बर सिद्ध साधु ऐसे हुए कि, जिनको चौथे घरका समाचार तो मिला पर उसकी विद्या नहीं मिली इस कारण उन्होंने ब्रह्माण्डके भीतर रहना स्थिर किया । सांसारिक कामना पृथक् नहीं हुई । उनको विद्या प्राप्ति भी नहीं हुई । पर तीनों लोकोंके भीतरकी प्राप्ति हुई । उनको सृष्टिके उत्पन्न करनेका बल भी हो गया वे अपनेको सृष्टिका उत्पन्न करता मानने लगे और अपनी अल्पबुद्धिवश अपनेको उन्होंने परमेश्वर मान लिया पर यथार्थ भेदसे अनभिज्ञ रहे । 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते रहे वे सब इसी जमादारकी तरह मारे गए । कारण यह कि, उनको इसका अण्डाकार घरेके भीतरही ज्ञान था उन्होंने न जाना कि, ईश्वर क्या वस्तु है और मैं क्या हूँ और जिन लोगोंने न पूर्ण विद्या पाई और ब्रह्माण्डसे पार होकर सत्यलोकको पहुँचे पूर्ण विद्यासे परिपूर्ण होगा । उनको कोई मार नहीं सकता । सहस्रों युक्तियाँ कीं पर फिर भी उनका बाल बाँका नहीं हुवा । वे न किसीके मारनेसे मरते हैं और न उत्पन्न होते हैं उनका जन्म मरण फिर कभी नहीं होता । उनका आवागमन एकबारगीही बंद हो जाता है । सिद्ध, साधु जिनमें वह विद्या नहीं वे अण्डाकार घरेके भीतर बंद हैं । वह राजकुमार जो पागलखानेमें बंद था, वह राजयोगीके समान है । वह राजकुमार जो नजरबंद था वह पागलखानेका बादशाह तो नहीं था । जैसे अन्यान्य पागल बंद थे वैसे ही वह बंद था । पर उसके मस्तकमें यह ध्यान था कि, मैं राजकुमार हूँ । भ्रान्त करके यह जीव ब्रह्मा जगत् इत्यादिका कौतुक देख रहा है । ज्ञानकी अवस्थामें न कुछ ब्रह्मा है न जगत्ही है । यह ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनों कुछ नहीं । उसके समस्त खेल और कौतुक और तमासे तथा जादूगरी हैं ।

अकालपुरुष एक महाप्रबल जादूगर है । जब वह भानमतीका पिटारा खोल देता है तब समस्त कौतुक प्रगट होने लगते हैं । जब वह अपना कौतुक समेट लेता है तब कुछ दिखाई नहीं देता सब शून्य हो जाता है ।

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