कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रेम तथा उसकी भक्ति न हो सकेगी । इस त्रियापशुमें तनिक भी मानुषिक बुद्धि नहीं होती । पर जब उसको मानुषिक शिक्षा मिले तो वास्तवमें वह मनुष्य बनजावे, नहीं तो सदैव इसी प्रकार फँसा रहेगा । इसको तनिक भी पहुँच, समझ तथा बुद्धि नहीं है कि, अपनी मुक्ति तथा छुटकारेकी युक्ति कर सके । उसके पास तनिक भी औषध नहीं कि बच सके ।
उद्धारकी दवा ।
उसके निमित्त केवल यही एक युक्ति है कि, यह साधु तथा गुरुकी सेवा करे । यदि यह साधु तथा गुरुकी सेवा न करेगा तो इसका बेड़ा कदापि पार न होगा । अवश्यही वह कालका भोजन बनेगा । इस संसारमें दो प्रकारके गुरु हैं—एक पाशविक तथा दूसरा मानुषिक । यदि इस सांसारिकको पाशविक शिक्षा मिलेगी तो उसके हृदयपर बुद्धिका कदापि विकास न होगा । इस संसारमें दोनों प्रकारोंके शिक्षक फिरते हैं । जो कोई उन दोनों गुरुओंमें पहचान करे, उन्हें पृथक् करके पहचाने, एकको छोड़कर दूसरेको ग्रहण करे वो सांसारिक बड़ा ही भाग्यवान् होगा । एक तो कपटी भेष बनाए कूट पुस्तकें लेकर हाथमें खप्पर लिए फिरते हैं । यह तो कालपुरुषका समाचार देते हुए उसकी सूचना चारों ओर फैलाते फिरते हैं । दूसरे श्वेत वस्त्र पहने हाथमें सूक्ष्म वेद तथा कमण्डलु लिये सत्यपुरुषके नामका प्रचार करते घूम रहे हैं । अतः जो कोई सत्यपुरुषके समाचारदाताओंके समाचारको स्वीकृत करेगा वह निश्चयही उत्पत्ति नदीके पार चला जावेगा । जिसने इस गुरुको पहचाना वह उनका चरणरज बन गया ।
मुहम्मद साहिबकी भाँग ।
मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक बार मुहम्मद साहबको जिब-राईल महाशय एक उद्यानमें ले गए । उसमें चालीस साधु बिलकुल नगन बैठे हुए थे । तब संध्याका समय निकट आया वे साधु सब भाँग घोटने लगे । जब भङ्ग घोंट चुके तब भङ्ग छाननेके निमित्त कोई वस्त्र नहीं था । उस समय मुहम्मदसाहबने अपने शिरसे साफा उतारकर दिया कि, इससे भंग छानो । तब उन साधुओंने मुहम्मदसाहबके साफेमें भाँग छानकर पीली । मुहम्मदसाहब पर प्रसन्न होकर नौ घूंट भङ्ग मुहम्मदसाहबको दीं उस नौ घूंट भङ्गके पीने से मुहम्मदसाहबको देवलोककी सुध मालूम हो गई । जो पदार्थ तथा आश्चर्यमय शक्तियाँ आपको मिलीं वह केवल उन्हीं नौ घूंट भङ्गसे थीं । तभीसे इस भङ्गके रङ्गसे मुहम्मदसाहबका साफा हरा हो गया । तबसे हातिमी जातिके श्रेष्ठोंने