कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरे वस्त्रोंको पहनना उचित समझा । मुहम्मदसाहबके श्रेष्ठका नाम हातिम था इस कारणही यह हातिमी वस्त्र कहलाता है ।
ग्रन्थल
ऐ आदम तेरे लिए जञ्जीर यह आई ।
तिफ्ली व जवानी व बुढापामें फँसाई ॥
लारेव सरासर यह हलाहल है हलाकू ।
तेरे लिए तो जान शकर शीर यह आई ॥
अब तेरा कहाँ साहब और सदगुरु साचा ।
सिखलाने सबक सिलसिला गुरु पीर यह आई ॥
शाही जिसे कहते वही बरबादी है अजिज ।
दिनकी नहीं उमीद शबे तीरह यह आई ॥
भावार्थ—ए मनुष्य ! तेरे लिये यह जँजीर आई है यही तुझे बाल्य जवानी और बुढापेमें फँसा रही है । यह सरासर पीते ही प्राण लेनेवाला, लव-लवाता भयंकर विष है, जिसे कि, तू अपनी अत्यन्त प्यारी वस्तु समझ रहा है । अब तेरे साचे सदगुरु कहाँ है यही तुझे नरकका सबक सिखलानेके लिये गुरु पीर चली आ रही है । जिसे तू शाही समझे बैठे है यही बरबादीकी जड़ है इसमें दिनकी उम्मेद नहीं है यही स्त्री रूपी रात है ।
ये चारों पशु इस भवसागरमें रहते हैं । एक दूसरे से बँर मंत्रो रखते हैं । इनकी बुद्धि तथा इनका विश्वास शुद्ध नहीं । ये इस भवसागरके कोड़े हैं । इनका इस नदीके पार जाना असम्भव है । पर सत्यगुरुकी दया सन्तसेवा और चाकरीसे छुटकारेका पथ मिल सकता है । चारों पशु इस और तो पिताके सिंहासन और राज्य तथा श्रेणीको चाहते हैं । उस ओर सांसारिक वासनाओंके आनन्दका उपभोग भी किया करते हैं । इन चारों पशुओंकी बुद्धि तथा विश्वास बड़ाही विचित्र है । उनकी बुद्धि तथा विश्वासमें तनिकभी स्थिरता नहीं है, उनकी बुद्धि तथा उनको विश्वास सदैवही डामाडोल रहा करते हैं ।
ये लोग सहस्रों प्रकारका पहनाव पहनते और भौंति भौंतिके भोजनोंसे अपने चित्तको प्रसन्न करते हुए आपको बहुत बड़ा तथा प्रतिष्ठित समझते एवं घमंडमें मस्त फिरा करते हैं । कोई वस्त्र पहने कोई नङ्गे कोई हरा पीला नीला नानाप्रकारके वस्त्र पहने रहते हैं । कोई अनाज छोड़कर दूध पीता है कोई फलाहार करता है । कोई मांस खाता है मदिरा पीता है कोई स्नान किया करता है कोई शीशपर जटा रखते हैं । कोई भभूत लगाकर बना फिरता है । कोई वस्त्र छोड़कर