कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंफुटकर-कबीर-जेहि बेरियां साई मिले, ताहि न भावे और ।
सबको सुखदे शब्द कर, अपनी अपनी ठौर ॥
कबीर-मनुष बेचारा क्या करे, जाका हृदया सुन्न ।
श्वान चौक बिठायके, फिर फिर चारै चुन्न ॥
कबीर-अंकुर भखै सो मानों, मांस भखै सो श्वान ।
जीव बधे सो काल है, सदा सो नरक निधान ॥
जिसका सत्य पुरुष वा उसके प्यारे मिल गये उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता क्योंकि, अपने दिव्य शब्दसे सबको सुख देते हुए अपने सच्चे स्थान-पर कर देते हैं । जिस मनुष्यका हृदय सूना हो वो विषयलंपट न हो तो क्या करे? क्योंकि, कुत्तेको जब चाहो तब चौक बिठा देखो वो मोका मिलतेही चूनही चाटेगा । अंकुरोंका भोजन करनेवाला मनुष्य तथा गोशतखोर कुत्ता एवम् जीवघाती काल है जो जीव हत्या करता है उसे अवश्यही नरक होगा, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है । कहे हुए चारों तरहके पशुओंमेंसे किसीमें भी बुद्धि नहीं है इसी कारण वे सदा आवागमनके चक्करमें फँसे रहते हैं ।
निर्बुद्धिताके अङ्गकी साखियाँ ।
कबीर- 'अकलविहीना आदमी, जानै नहीं गँवार ।
जैसे कपि परवश परा, घर घर नाचै बार ॥
कबीर- अकलविहीना सिंह, ज्यो गया सत्यके संग ।
अपनो प्रतिमा देखके, भयो जो तनको भङ्ग ॥
कबीर- अकलविहीना अंधगज, पन्यों फंदमें आय ।
ऐसेही सब जग बंधा, कहा कहूँ समझाय ॥
कबीर- पछताता परवश परचो, सुवाके बुधनाहि ।
अकलविहीना आदमी, यों बन्धा जग माहि ॥
कबीर- अकल असँसे उत्तरी, विन्धों दीनी बाँट ॥
एक अभागी रह गया, एकन लीनी छौट ।
कबीर- बिना वसीले चाकरी, बिना बुद्धिकी देह ॥
बिना ज्ञानको जोगना, फिरे लगाए खेह ॥
कबीर- जल पर पावे मछली, कुलपर "भाते बुद्धि ।
जाको जैसा गुरु मिला, ताकी तँसी सुद्धि ॥
१ निर्बुद्धि, २ बंदर, ३ चमकना अस्त्र, ४ मदान्ध हाथी, ५ अयो, ६ ऊपर, ७ परमात्मा, ८ दूसरे बुद्धिमान, ९ जरिये, संसर्ग, १० शरीर, ११ विभूति या साधु व साधु १२ रदी, १३ धरानेके अनुसार, १४ होती है, १५ स्मृति या बुद्धि,