भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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शरीर पाता है तब अपनी पूर्व करनीके अनुसार ही पाता है । सूरत तथा ज्ञान भी वैसाही होता है । यदि पशु योनिमें जावे तो भी अपने पूर्व काय्योंके अनुसार यह दुःख सुख पाता है । कितने पशु शिक्षाग्राही होते हैं । कितने पशुओंको भविष्यका वृत्तान्त मालूम रहता है इसका कारण यह है कि, उन लोगोंमें जो पूर्वकालमें विद्याकी ज्योति थी उसके प्रभावसे वर्तमान शरीरमें भी कुछ विकास करती है । मनुष्योंके समान कोई कोई पशु भी भविष्यत्का हाल जानते हैं एवं शिक्षाग्राही होते हैं । यह जीव समस्त गुण तथा हुनरोंकी जननी है, पर जबलों यह दूषित है तबलों कर्मोंका गुलाम है । यह पढ़े लिखे तथा अपढ़ दोनोंको एक समान है, दोनोंका विश्वास एकसा है क्योंकि, जिस देशमें वेद तथा पुस्तकें हैं उस देशके लोग तो उन्हींके अनुसार विश्वास करते हैं जहाँ वेद तथा पुस्तक कुछ नहीं है, वहाँके लोग जैसा कुछ अपनी बुद्धिसे ठहराते हैं वही करते हैं, कितनेही टापू हैं जहाँके लोग अक्षरतक भी नहीं पहचानते वहाँके लोग जैसा कि, कुछ उन लोगोंने अपनी बुद्धिसे ठहराया, वही मृत्युतक उनको दिखाई दिया करता है । इसी प्रकार एम्रिकादेशके प्राचीन निवासी ऐसा अनुमान किया करते थे कि, जो वस्तु अथवा जो जीव इस पृथ्वीपर नष्ट होते हैं उसी सूरतमें दूसरे जीव प्रगट हो जाते हैं । उसका एक विचित्र उदाहरण में ग्रंथ कबीर भानु-प्रकाशमें लिखा जा चुका है । देखलो जैसा जिसको गुरु मिला वैसीही उसकी बुद्धि तथा वैसाही उसे विश्वास हो गया है ।

पारकारनलकी साखी ।

कबीर बेड़ा सारका, ऊपर लादा सार ।
पापीका पापी गुरु, यों बड़ा संसार ॥
कबीर जाका गुरु है अँधरा, चेला खरा निरंधर ।
अन्ध अंधको ठेलियाँ, परे कालके फंद ॥
कबीर कौंचे गुरुके मिलनसे अगली मिलगई ।
चाल थे हारे मिलनकों, "दूनी विपत" पड़ी ॥
कबीर अंधा गुरु अंधा जगत्, अंधे हैं सबदीन ।
गगनमंडलमें बजरही, सुवनि अनहद बीन ॥
कबीर झूठे गुरुके पक्षको, तजत न कीजे बार ।
द्वार न पावे शब्द नहीं, भटकें बारम्बार ॥

१ नाव आदिका समूह, २ सत्यपुरुष, ३ डूबगया, ४ पूरा, ५ अज्ञानी, ६ ढकेला,
७ अघूरे, ८ अगाडीकी, ९ डूबगई १० दुगुनी, ११ विपत्ति, १२ दुखी, १३ आकाशी नक्कारे
१४ छोड़ते, १५ देर, १६ मार्ग ।