कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 552, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोक आपनो मोहि दिखाओ । वचन प्रतीत सत्य मन लाओ ॥
तब मैं गहुँ तुम्हारे वचना । छूटै मोर जनम औ मरना ॥
सतगुरु वचन ।
यह सुनि साहब चले रेंगाई । मुनिको लेकर लोक सिध्दाई ॥
देखा दृष्टि हंसकी पाँती । युत्थ युत्थ बैठे बहु भाँती ॥
धनुष मुनि वचन ।
तब मुनि गहे धनीके पाई । अब साहब मोहि लोक दिखार्ई ॥
सुफल जन्मममकीन्ह कृतारथ । पावन कोन भयोशुभ स्वार्थ ॥
चलो गोसाई अब हम चीन्हा । देहु पान आपन करलीन्हा ॥
सत्य कबीर वचन ।
मुनि कहलाय बेग भवसागर । ततक्षण शब्द गहै चितनागर ॥
माला ताहि गलेमें दीन्हा । श्रवण सरवनी बाधन लीना ॥
यमसे तिनका तोच्यो भाई । हिरदय शुद्धकर पान पवाई ॥
धनुष मुनि लीन्हों परवाना । चाखत पारस कीन्ह पयाना ॥
देह तजिके दीन रेंगाई । पुरुष लोकमें बैठे जाई ॥
हंसहि हंस मिले सब संगा । शब्द पाय भए निरमल अंगा ॥
धनुष मुनि वचन ।
भूलचूक अब मेटु हमारा । तुम जीवनके तारनहारा ॥
यह तो लोक अच्छय तुम राखा । अगम निगम जेहि गम न भाखा ॥
सुर नर मुनि कोई भेद न पाई । तीन लोक जीवकाल सताई ॥
यह जग मायामोह फंदाना । राग रङ्ग निशिबासर साना ॥
चेतत नाहीं मूढ गँवारा । पकड़ पकड़ यम मारि संधारा ॥
निर्गुन नाम भाषि तुम दीन्हा । ताहि नाग विरला कोई चीन्हा ॥
तीनों गुणका बड़ा पसारा । जप तप योग यज्ञ मन धारा ॥
पुरुषकी भक्ती कोई न जाने । आप आपको ब्रह्म बखाने ॥
घटमें काल विषम बटपारा । कैसे हंस पहुँचे दरबारा ॥
लोक लोक भाखै नर लोई । लोक मरम नहि जानै कोई ॥
साखी— धन्य नारि नर नाम धन्य, सर्वे वीच निजपान ।
जा परताप यहि लोकमें, पहुँचे लोक ठिकान ॥
तात्पर्य—यह धनुष मुनि अपने समयके बहुत बड़े योगी थे । जो अपने योग तथा प्राणायामके बलसे बहुत कालपर्यन्त जीवित रहे थे । उन्होंने अनेकानेक