कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति स्थिति तथा विनाशोंको देखा था । जब कबीर साहब उनको मिले तब कबीर साहबने तबसे क्षीणकाय हुए धनुष ऋषिसे पूछा है कि आप किस लिए इतना कष्ट उठा रहे हैं ? यह सुन कर उक्त ऋषिने उत्तर दिया है कि, मैं मूल वस्तुके लिये तप करता हूँ अजपा जाप जपता हूँ । यह सुनकर कबीर साहबने कहा है कि इस बखेड़ेको छोड़ दो सत्यपुरुषकी भक्ति करो । पीछे उन्हें सत्यलोक दिखाया गया है वहाँ धनुष ऋषिने चरण पकड़कर बड़ी प्रशंसा की है । इसी बातका विवरण कहे गये अम्बुसागरके इन वचनोंमें हैं ।
गुप्त मुनि ।
अम्बुसागरके ग्यारहवें तरंगमें नंदी युगकी कथा आयी है उसीमें गुप्त-मुनिका वृत्तान्त आया है । कबीर साहब धर्मदासजीसे कहते हैं कि, मैं नन्दी युगमें कौंवहीपमें पहुँचा, वहाँ मुझे गुप्तमुनि मिले मैंने उनके साथ गोष्ठी की वो कैसे हुई यह यहाँही उद्धृत करते हैं —
सत्य कबीर बचन ।
युग नन्दी हम कीन पयाना । पुरुष आज्ञाते तहाँ सिधाना ॥
कौंच द्वीपमें पहुँच्यो जाई । जहाँ काल दधि सिन्धु बताई ॥
तहवाँ एक हंस निर्वाना । तासे गुष्টি जाय हम ठाना ॥
बैठ अरम्भ । गुफा अनुरागा । मायामोह छोड़ चित पागा ॥
नाम गुप्त मुनि तासु रहाई । दृष्टी मूँदि ध्यान मन लाई ॥
जाय निकट बैठे हम जाके । खोल चक्षु मुनि हम कहि ताके ॥
बूझे तिन तुम को हौ भाई । अपनो नाम कहो समझाई ॥
सुन्दर रूप अधिक तनशोभा । देखत रूप उठत अति लोभा ॥
अङ्ग अङ्ग तुम्हरो चमकारा । शोभामुनि जिमि अगम अपारा ॥
कोट बरस हम इहवां तप कीना । ऐसो रूप न कबहूँ चीना ॥
अब तुम कहो आपनो नामा । कौने देश बसो केहि ग्रामा ॥
सत्य कबीर बचन ।
सतगुरु कहे सुनो मुनि राऊ । आपन भेद तोहि समझाऊँ ॥
हम तो अमरलोकके वासी । जहवाँ अजर पुरुष अविनासी ॥
तहाँ काल नहि व्यापै फँदा । हंस तहाँ बहु करें अनन्दा ॥
अमियपुरुष तहाँ आपविराजा । अनहद बाजा बाजै छाया ॥
जीव कष्ट जब देख अपारा । आयसु दीन आय संसारा ॥
ल्यावहु जीव काटि यम फँदा । देओपान मेटो दुःख द्वंदा ॥