भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 561

“यहि अन्तर । यक कीन्ह तमाशा सो चरित्र भाषों धर्मदासा ।” यहाँ से लेकर “सकलजीव कीन्हें परमाना, अब सब साहिब सुधरे कामा” यहाँतक जो कुछ प्रकरण अम्बुसागरमें आया है उसका सार यहीं लिखते हैं कि, फिर कबीर साहब धर्मदासजीसे कहते हैं कि, ए धर्मदास ! हमने एक फिर ऐसा कौतुक दिखलाया कि, उस तालाबके भीतर एक वटवृक्ष था, उस वृक्षपर मैं तोता होकर बैठ गया । इस तोतेको देखकर शिकारी दौड़ आया, तोतेके ऊपर तीर चलाया । वह तीर तोतेको तो नहीं लगा, पर शिकारीकी ओर पलट आया, वह शिकारी भयभीत होकर भाग गया, उसने जाकर दो चार मनुष्योंसे इस तोतेका समाचार दिया । तब अन्यान्य कितनेही लोग दौड़कर आए गुलेल द्वारा तोतेको मारने लगे ! जिन लोगोंने गुलेल चलाया सबकी गुलेल टुकड़े टुकड़े हो गई । दश बीस पचास मनुष्य खड़े कौतुक देख रहे थे । तालियों बजा बजाकर उस तोतेको उड़ाते पर वह न उड़ता लोग ढोल बजाते तो भी वह अपनी जगहसे न उड़ता । लोगोंने राजाको समाचार दिया कि, महाराज ! वटवृक्षपर एक अतिसुन्दर तोता बैठ रहा है । न उसको तीर गुलेल इत्यादि लगता है; न वह तालियों ढोल आदि बजानेसे उड़ता है; तात्पर्य यह कि, किसी युक्तिसे वह अपने स्थानसे नहीं उड़ता । इतना सुनतेही वो राजा वहाँ आ पहुँचा उस तोतेको वृक्षपर बैठा देखकर चोबदारोंको आज्ञा दी कि, शिकारियोंको बुलावो । सब शिकारी तुरंत आकर उपस्थित हुए । चिड़ीमारोंसे राजाने कहा कि, जो कोई इस तोतेको फँसाकर मेरे पास लावेगा वह जो कुछ माँगेगा, मैं उसको दूंगा । तब सारे शिकारी उस तोतेको फँसाने लगे । वे लोग बड़ा फँदा बनाते तो वह तोता छोटा हो जाता । जब वह फँदा छोटा करें तब वह तोता बड़ा हो जाता । सहस्रों युक्तियों की गई पर वह तोता पकड़नेमें नहीं आया । राजा उस तोतेका सौंदर्य देख ऐसा आसक्त हुवा कि, सात दिवसोंपर्यंत भोजन नहीं किया । वह तोता वटवृक्षपरसे उठकर राजप्रसाद पर आ बैठा । इस तोतेका शरीर ऐसा तेजोमय तथा कान्तियुक्त था कि, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, राजाने जान लिया कि, यह तो वही शुक्र है जिसके निमित्त मैंने बड़े यत्न किए थे । तब रानीने दूध चावल, सुवर्णकी कटोरीमें इस शुक्रके सामने रक्खा । वह आकर रानीके हाथपर बैठ गया, उस समय राजा तथा रानीको बड़ा हर्ष हुवा । सुनारोंको बुलाकर आज्ञा दी कि, तुममें जो बड़ा निपुण हो वह इस शुक्रके लिये पिंजरा बनावे । पच्चीस सहस्र अशरफियों सोनारोंको दीं, सुनार पिंजरा बनाने लगे । उस पिंजरेमें सवालाख हीरे तथा मोती लगे ।