कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसात सहस्र लाल लगे । जब वह पिंजरा प्रस्तुत हुवा तब उसमें उस तोतेको रक्खा, रानी तोतेको पढ़ाने लगी कि, तोता ! तू राम राम कह । उस समय तोता बोला कि, ए राजा रानी ! ध्यान दो कि, तुम्हारे ऊपर कालचक्र घूमता है उसके भयसे भयभीत हो । यह बात सुनकर राजा कुछेक तो सचेत हुवा फिर निश्चितता तथा धनके मदमें किसको ज्ञान होता है ? तब उस तोतेने सोचा कि, राजाको इस प्रकार ज्ञान नहीं होगा । अपनी शक्ति इस प्रकार प्रगट कि, की राजाके महलोंमें आग लग गई, सब कुछ जलने लगा । जब हाथी और घोड़ों पर आग दौड़ी, तब राजा घबरकर रानीसे कहने लगा कि, तोता जला कि बचा ? कारण यह कि, राजाको तो इसी तोतेसे बड़ा प्रेम था । रानी रोककर कहने लगी कि तोता तो जला अब हमारे भाग्य फूटे । राजाने आदमियोंको बुलाकर कहा कि, तोतेको देखो । लोगोंने देखा कि, समस्त धन सम्पत्ति जल रहा है पर तोतेके पिंजरेको अग्नसे तनिक भी हानि नहीं पहुँचती । पिंजरेपर्यन्त तनिक भी गर्मी नहीं पहुँचती है । पश्चात् अग्नि बुझी राजा रानी देखने दौड़े । तोतेको पिंजरे सहित सुरक्षित पाकर अत्यन्त आह्लादित हुए । तोतेको अपने हाथसे पकड़कर अपनी छातीसे लगाया । राजा रानी शोचने लगे कि, यह शुक्र नहीं, वरन् सिर्जनहार है । राजा रानी हाथ बाँधकर निवेदन करने लगे कि, ऐ तोता ! तुम बारह बरस हमारे घर रहे, अब तुम अपना तात्पर्य बताओ । तब वह तोता पिंजरेसे बाहर निकल कबीर साहबका स्वरूप हो राजाको समझाने लगा कि, ऐ राजा ! मैं तुम्हारा सत्यगुरु हूँ, तुम्हें मुक्तिप्रदानार्थ आया हूँ कि, अब तुम यह देह छोड़कर सत्य लोकको चलो । तब राजा रानीने सत्यगुरुको पहचाना, आपके चरणों पर गिर पड़े राजा रानी अपनी सन्तानों सहित सत्यगुरुके चरणों से चमट गए, रत्नजटित स्वर्णके सिंहासनपर सत्यगुरुको बैठाया सब सेवा करने लगे । इस राजाके चौदाहवीं रातके चंद्रके समान तेरह रानियाँ थीं, अति स्वरूपवती पाँच बेटियाँ और चार पुत्र थे । वे सब कबीर साहबसे दीक्षा लेकर भक्ति करने लगे इसके साथ अन्यान्य मनुष्योंने भी सत्यगुरुकी दीक्षा ली । कुल एकतीस मनुष्य परम धामको पहुँचे । इस राजाके समयमें अट्ठाईस हाथ लम्बा और चौदह हाथ चौड़ा पान था, दो हाथीके बराबर नारियल था । तब राजा उसके साथी गदगद वाणीसे सत्यगुरुकी वंदना करने लगे ।
स्तुति—हंस नायक परम लायक, आय प्रभु दर्शन दियो ।
काग पलट, मरालकर, भौंसिंधु बूढत गहि लियो ॥
ए सत्यलोकमें रहनेवाले हंसोंके स्वामी ! हे समर्थ प्रभो ! आपने