भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 588

चौ०- महादेव तुम मतिके हीना । तुम नहिं माया पुरुष को चीना ॥
ताते तुमहूँ गरव भुलाई । तुम्हरे मारे कोई न जाई ॥
तुम कंचक हो जीव विचारा । तुम्हरे कहे होई का पारा ॥

साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुनिये सत्य विचार ।

वह तो पुरुष अखण्ड है, तुम नहिं पाओ पार ॥

चौपाई-तुम भूले आपाको थापी । आप थाप भये तुम जापी ॥

जब देवताओंको घमण्डी देखा तब सत्य गुरुने एक ऐसा कौतुक दिखलाया कि, बङ्ग-देशका ब्राह्मण कुमार (जिसकी मृत्यु निकट आ चुकी थी) समीप था, अब वह मर जावे । मृत्युके भयसे भयभीत होकर देवताओंके शरणमें आया कहा कि, मेरे प्राणोंको बचाओ । इतनी बात सुनकर देवताओंने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम तुमको नहीं बचा सकते । यमराज महाप्रबल है । उसी समय गरुड़जीने सत्यगुरुकी कृपासे उस बालककी प्राणरक्षा की । देवताओंने लज्जित होकर सिर झुका लिया । गरुड़जीकी श्रेष्ठता तथा उच्चता अच्छी तरह प्रमाणित हो गई । उस समय लोग गरुड़जीकी प्रशंसा करते हुए धन्य धन्य कहने लगे । गरुड़जी सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश करते हुए सहस्रोंको भक्तिमें लगाने लगे । जो कोई आपके सामने वाद-विवाद करने आवे तो सबको परास्त कर दिया करते थे । जिस किसीको सन्देह हो वो उक्त ग्रंथमें देखकर अपने संदेहको मिटा सकता है ।

दुर्वासा ऋषि ।

दुर्वासा ऋषि बड़ही सुप्रसिद्ध बलिष्ठ तपस्वी और क्रोधी थे । क्योंकि, दुर्वासा शिवके अवतार अथवा अंश कहे जाते हैं । अत्रिमुनि तथा अनसूयासे तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे । पहिला ब्रह्माका अंश चन्द्रमा, दूसरा विष्णुका अंश दत्त दिगम्बर सन्यासियोंके गुरु और तीसरा शिवका अंश दुर्वासा ऋषि था । इसके भयसे समस्त इन्द्रादि देवता और मनुष्य भयभीत होते थे । क्योंकि, ये शीघ्रही शाप देकर सत्यानाश कर देते थे । राजा इन्द्रको शाप देकर दरिद्र कर दिया । छप्पन करोड़ यादव और कृष्णकी संतानोंको क्रोधसे नष्ट कर डाला । इस कारण सब मनुष्य उनसे भयभीत होते हुए सदा कौपते रहते थे । जब सत्यगुरु कबीरसे साक्षात्कार हुआ ज्ञान सुना, तब सत्यगुरुके शरणमें आनेसे उनके समस्त दोष नष्ट हो गये । सत्यगुरुके हंस होकर मुक्तरूप हो गये, फिर तो दुर्वासाका समस्त क्रोध तथा रुष्टता जाती रही, वे शान्त तथा सतोगुणसे परिपूर्ण हो गये । दुर्वासा बोध मुझको मिल नहीं सका, नहीं तो मैं उसमेंसे कुछ यहाँ लिखता ।