कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५.
कबीर साहिबके कलियुगके शिष्य ।
शाहंशाह इब्राहीम अद्वम् ।
सुलतान * इबराहीम अद्वम बड़ा सन्नाट् था । उसकी राजधानी बलखबुखारमें थी । यह बादशाह मुहम्मद साहबकी मृत्युके कुछ वर्षोंके पीछे ही हुआ था । इस बादशाहकी मृत्युकी तारीख पुस्तक जवाहिर फरीदीके अनुसार यह है—सुलतान इबराहीम अद्वमने २६ माह जमादिउल अब्बल सन २८० हिजरीमें इस संसारको त्यागकर उस संसारकी ओर कूंच किया था । यह बड़ा शाहंशाह जिसके कि अधीन बहुत बादशाह थे । बड़ाही चिन्तित हुआ कि, मुझको कोई सच्चे परमेश्वरका पथ दिखावे इसीमें दिन रात रहता था । यह बात बिना साधुओंकी दयाके प्राप्त नहीं हो सकती, इसलिये अनेक साधुओंसे उसने पूछा भी परन्तु कुछ पता न लगा, तब उसने बड़ाही ऋद्ध हो कहा कि, ये सब साधुगण मक्कार तथा झूठे हैं । यही नहीं अनेक साधुओंको पकड़कर कहा कि, अपने कौतुक दिखाओ । नहीं तो चक्की पीसो और हरासका खाना छोड़ दो । सब साधु चक्की पिसने लगे । इस प्रकार जब साधुगण विपत्तिमें फँसे तब समस्त साधुओंके राजा, समस्त संसारके रचयिता, परमात्माका दयालु हृदय विचलित हुआ । पितृक दयाने लहर मारी । सत्यगुरु कबीर बन्दी छोड़ जिन्दा साधुका स्वरूप धारणकर शहर बलखकी ओर रवाना हुये । पथमें जाते हुये देखा तो दो मनुष्य वाद विवाद कर रहे थे । एक कहता था कि काबा * आकाशपर है तो दूसरा कहता था कि, असम्भव बात है काबा पृथ्वीपर है ।
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बलखका बादशाह इब्राहीम नानाकी गद्दीपर बैठ था इसके पिताका नाम अद्वम शाह था । इसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त तो यों है कि एकवार अलमस्त फकीर अद्वमशाह बलखकी एकमात्र शाहजादीपर आशिक हो गये थे, सद्गुरुकी कृपासे शादीके बादके ४० अमूल्य मोती बंजीरको देनेपर भी सिसकते जंगलमें फिकवा दिये गये थे । इसके थोड़ी देरबाद मरी हुई शाहजादीको कबरसे निकालकर अपनी कुटीमें ले आये थे । वहाँ भूले हुए काफिलेके वैद्यने हाथमें नस्तर देकर उस शाहजादीको उस समय सजीव कर दिया । जब कि, आप उस मृतकको भी लकड़ियोंके सहारे खड़ी करके दुख भरे शब्दोंके साथ उसका दीदार कर रहे थे । जीवित होनेपर इस शाहजादीने फकीरी अख्तियारकी तथा अद्वमशाहके साथ शादी की । उसी पर्ण कुटीमें इब्राहीमका जन्म हुआ, बड़ा होनेपर पाठशालामें नानासे पहिचाना जाकर भासहित राजमहलमें पहुँच गया तथा नानाके मरनेपर उसकी जगह बादशाह हुआ । यह कबीर सागर नं. ६ सुलतान बोधके ६६ पेजसे लेकर ९४ तक पृष्ठ में लिखा हुआ है ।
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मुसलमानोंका पूज्य स्थान जो अरब देशमें है जहाँ हज्ज करनेको जाते हैं ।