कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर साहबने दोनोंका निबटेरा कर दिया । दोनोंको दोनों जगह आकाश और पृथ्वीमें काबा दिखला दिया । उन दोनोंने देखकर प्रसन्न हो सत्य गुरुको धन्यवाद देते हुये अपने अपने घरकी राह ली । कबीर साहब नगर बलखमें जा पहुँचे । देखा तो बड़े बड़े धर्मस्वरूप चक्की पीस रहे हैं । तब कबीर साहबने चक्कियोंके निकट जाकर अपना डण्ड घुमाकर कहा कि, ऐ चक्कियो ! ऐसे ऐसे माहात्माओंको आटा पीसनेमें लगाया है तुम आपसे आप चलो । इतना कहते ही सारी चक्कियाँ आपसे आप चलने लगीं । सब साधू पृथक् हो बैठे, कबीर साहबने शाहंशासके सेवकोंसे कहा कि, जाकर शाहंशाससे कहो कि, जितना गेहूँ तुम्हारे पास हो भेज दो पीस दिया जावेगा । यह कहकर कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । सेवकोंने बादशाहसे जाकर कहा कि जापनाह ! सब चक्कियाँ आपसे आप चल रही हैं । एक जिन्दा फकीर आया है कि, जिसने अपनी लकड़ी घुमाकर चक्कियोंको चलनेको कहा जिससे वे आपसे आप चल रही हैं, जितने गेहूँकी इच्छा हो आप भेज दीजिये वह सब पिस जावेगा । बादशाहने जाकर देखा तो सब चक्कियाँ आपसे आप चल रही हैं चलानेवालेका पता नहीं है । बादशाह दूढ़ने लगा कि, जिस साधूने चक्कियाँ चलाई वह कहाँ गया ? यद्यपि बहुत कुछ दूढ़ा पर न पाया ।
चौ० - बलख शहर एक नगर अनूपा । तहां सुलतान जो ज्ञान स्वरूपा ॥
बादशाह शाहन सरदारा । प्रेम प्रीति मन मांहि विचारा ॥
इबराहीम अद्वम तेहि माना । राजहि मांहि भगति उन ठाना ॥
× षट् दर्शन कह बूझ्यो भाई । कौन राम और कौन खुदाई ॥
नहि तुम सबही कहो दिवाना । ना तुम दूर करो कुफ़राना ॥
- इतनी बात जबहि सुनिपाई । तब उठि धाये आप गोसाई ॥
जिन्दारूप गोसाई कीना । आय शाहको दर्शन दीना ॥
बैठे तखत आप सुलताना । जिन्दा कीन्हौं दोआ सलामा ॥
दोआ हमारी उन नहि माना । मायाके मद गर्व दिवाना ॥
× कबीर सागर नं. ६ में सुलतान बोध है इसमें शाहन्शाह इब्राहीम अद्वम और बलख बुखारेका वैराग्य पूर्ण चरित्र आया है । इसके कबीर साहब वक्ता तथा धर्मदासजी श्रोता हैं । पहिली तीनों चौपाईं वर वर ठीक हैं पर चौथी चौपाईका उत्तरार्ध नौमी चौपाईका है । पूर्वार्ध किन्हींके आशयपर लिखा है साक्षात् नहीं मिलता । = चौथीके बादकी पाँचवी सुलतान बोधमें क्रमके अनुसार चौथी चौपाईसे परे है ।
× इसके बाद आठ चौपाई और दो दोहाओंको पीछे छठी आदि चौपाई आई हैं । सुलतान बोधमें 'जबहि' के स्थानमें 'काशी' लिखा हुआ है किन्तु काशीके स्थानमें 'जबहि' लिखना ही उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि, उस समय आपका काशीमें प्रादुर्भाव नहीं हुआ था ।