भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 769, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 769

बच्चे लोटन होते हैं । परन्तु मनुष्यका बच्चा सदैव शिक्षा तथा गुरुके पथ दिखाने के आधीन रहता है । गुरु बिना इसका कोई ठीक नहीं होता । न कोई बुद्धि आती है इसी कारण किसीको पूर्णता नहीं है । परन्तु जो श्रेष्ठता तथा निपुणता मनुष्यको होती है वह और किसीको नहीं होती । यही मनुष्य देवताओंसे श्रेष्ठ तथा सर्व जीवोंसे अधमभी है । यदि मनुष्य गुरुद्वारा अच्छा काम न करे तो यह तुच्छसे तुच्छ और नीचसेभी नीच होजाता है ।

३-वैदिकी धर्म स्वसंवेदसेही बने हैं । चारों स्वसंवेदकी भीतरी बातें हैं । इस कारण वेद आवागमनके विषयमें स्वसंवेदसे समानता रखते हैं । सर्व ज्ञानी साधु आवागमनकी साक्षी देते हैं ।

कलञ्जनके पर्वतपरके सात शिकारी, दस हिरन मानसरोवर तालाबका एक हंस और सिंहलद्दीपका एक चकवीने गुरुक्षेत्रमें ब्राह्मणका जन्म पा वेद पढ़कर ज्ञान प्राप्त किया था ।

वशिष्ठ पुराणमें लिखा है कि, एक मनुष्यने चाहा कि, मैं बड़ी तपस्या करके अपना इतना बड़ा शरीर करूँ कि, मायासे पार जाकर ब्रह्मसे मिल जाऊँ । वह कठिन तपस्या करके अपना शरीर बढ़ाने लगा । उसकी देह बहुत बड़ी हो गयी पृथ्वीसे लेकर ऊपर इन्द्र लोक इत्यादिसे उस पार ऊँची चली गयी । उसका शरीर जब बहुत बड़ा हुआ । उसने देखा कि, मैं तो अब बहुत बड़ा हुआ तो उसने सत्यब्रह्मका ध्यान किया तब उसकी देह छूट गयी, वह मर गया । वह मरकर मच्छड़ हो गया क्योंकि, मरते समय उसका ध्यान मच्छड़की ओर था । वह मच्छड़ घासोंमें रहने लगा पश्चात् उसको एक हिरनकी लात लगी । मरनेके समय उस मच्छड़का ध्यान उस हिरनकी ओर होनेसे वह मच्छर मरकर हिरन होगया । उस हिरनको एक शिकारीने मारा । मरनेके समय उस हिरनका ध्यान शिकारीकी ओर हुआ । तब वह हिरन मरकर शिकारी होगया । वह शिकारी शिकार खेलने के लिये जङ्गलमें फिरने लगा । फिरते फिरते एक ऋषीश्वरसे मुलाकात होगई, तब उस ऋषिने उस शिकारीको शिक्षा दी जिस उपदेशसे वह पुनः तपस्या करके जीवन्मुक्त होगया ।

एक मकोड़ेकी आधी पिछली देह कट गयी थी आधी अगली साबित थी । वह अपनी आधी देहको घसीटे लिये जाता था । उसको देखकर एक मनुष्यने अपने गुरुसे पूछा कि, हे महाराज ! इस चीँटाने भी कभी मनुष्य शरीर पाया होगा । गुरुने कहा कि, मनुष्य होनेका तो क्या हिसाब, यह चिउँटा चौदह बार इन्द्र हो चुका है ।