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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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थे पर वह स्त्रीके लिये चिन्तित था। तब उसके पिताने उसे एक जोरू भी ला दी, वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। वे दोनों मूर्खताके तिमिरमें फँसे हुये थे, वे दोनों अज्ञानतावश निर्दोष तथा भोले भाले कहलाते थे। पिताको चिन्ता हुई की, मेरी सन्तान मूर्ख न रह जावे, इनको विद्या सिखाना आवश्यक है जिसमें वे जाने कि, वे किस लिये उत्पन्न किये गये हैं? ऐसा न हो कि, वे सदैव मूर्खावस्थामें ही पड़े रहें। इस कारण उसने एक विवेकका वृक्ष लगाया कि, उसके खानेसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान हो जावेगा और भला बुरा जाना जावेगा, इसके पीछे उसके पिताने शैतान गुरुको शिक्षार्थ भेजा, जिस फलके खानेको खुदाने मना किया था उसे उसने उभाड़ कर फलको उन दोनोंको खिला दिया। जैसे प्रत्येक मनुष्यको इसीकी चिन्ता होती है कि, किसी प्रकार मैं उभार कर अपने शिष्योंको विद्या तथा सभ्यता सीखने पर प्रस्तुत करूं, इसी प्रकार शैतानने फुसलाकर उन्हें फल खिलाया, जिससे आदमको विद्या हुई, वे वैकुण्ठसे निकाले गये। क्यों कि, वे सर्व पदार्थ मूर्खोंके लिये हैं जबतक मनुष्यमें मूर्खता है तब तक नरक तथा वैकुण्ठमें ही फँसा रहता है, जब जीवको विद्या होती है तब नरक तथा वैकुण्ठके दुःख सुखको मिथ्या तथा क्षणभंगुर जानता है। जब नरक तथा वैकुण्ठको तुच्छ समझकर भजनमें लगता है तब उसके मनसे सभी वासनाएं पृथक् हो जाती हैं, उनके पृथक् होनेसे सर्वज्ञताके योग्य होजाता है। महाप्रलयमें सब जीव निरञ्जनमें समा जाते हैं, ब्रह्मा तथा कीड़े मकोड़े आदि सभी अपने कम्मोंके साथ निर्जीवके समान निरञ्जनमें रहते हैं। उत्पत्तिके समय पूर्वके कम्मोंके अनुसार फिरसे शरीर धारण करते हैं। संसारमें प्रत्येक अपनी भलाई बुराईके अनुसार स्वरूप पाते हुए उसीके अनुसार दुःख सुख भोगते हैं। मनुष्यके बच्चोंके सब रङ्ग ढङ्ग आदममें प्रगट थे। इससे यही परिणाम निकला कि, आदम अनगिनती बार पहले भी जन्म ले चुका था, वही अब आदम हुआ, भविष्यमें भी अनेक बार जन्म धरेगा। यद्यपि आदम खुदाके सामर्थ्यसे उत्पन्न हुआ था तो भी अपने पूर्वजन्मोंके कार्यको प्रगट करता था। यह सम्भव नहीं कि, पवित्र आत्मा जब सशरीर हो तब दुःख सुखके बन्धनमें फँसे। यदि वह आत्मा अपने पूर्वजन्मोंके कम्मोंसे अशुद्ध न होती तो यह अवस्था कदापि न होती, इस कारण जानना चाहिये कि, अनगिनती जन्मोंसे यह जीव बराबर आवागमन करता चला आता है और भविष्यमें भी करता जावेगा। जब तक उसको शुभ और अशुभका सम्बन्ध न टूटे तबतक पिता तथा पुत्रका कर्तव्य है, तहां तक तो खुदाने आदमको सिखलाया परन्तु गुरु बिना ज्ञान नहीं होता, इस कारण अबलीस (शैतान) को भेजा, जिसमें उसके द्वारा ज्ञान पावे। यदि हजरत अबलीसकी दया न होती तो

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