कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ें१०-देखो ! (१०४) जंवर (२९ से ३०) आयत पर्यन्त लिखा है कि तू अपना मुँह छिपाता है वे हैरान होते हैं। तू उनका दम फेर लेता है तब वे मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमें मिल जाते हैं। तू अपना दम भेजता है तब वे फिर उत्पन्न होते हैं तू पृथिवीको फिरसे सुसज्जित करता है।
तात्पर्य-तू अपना मुँह छिपाता है-आत्मा जो प्रकाशरूप है जब उस पर परदा पड़जाता है तब अन्धकारमें पड़कर वे हैरान होते हैं, सब जीव दुःखित होते हैं कहीं राह नहीं मिलती। तू उनका, दम फेर लेता है उससे वे मर भी जाते हैं तब तू उनके आत्माकी शरीरसे अलग करता है तो वे सब शरीर मर जाते हैं, अपनी मिट्टीमेंसे उत्पन्न होकर फिर मिट्टीमें ही मिल जाते हैं, तू अपना स्वास भेजता है प्रकाशरूप आत्माही अपने स्वासरूप जीवको भेजता है क्योंकि, सब कुछ आत्मासेही हुआ है। पांच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्री इसीसे हैं, आत्मा जब स्वास भेजता है तब वे जीव पुनः उत्पन्न होते हैं यही आवागमन सदा प्रचलित रहता है।
११-(१२१) जंवरमें (७ से १८) आयत तक देखो। खुदा प्रत्येक कुकर्म से तुझको बचावेगा। खुदा तेरे आनेजानेमें उस समयसे लेकर सर्वदा तेरा रक्षक रहेगा।
तात्पर्य-आने जानेसे तना सुखका तात्पर्य है चिरकालतक आने जानेका तात्पर्य आवागमनके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं ठहर सकती। जबकि, मनुष्यके आयुकी सीमा है तो सर्वदा इसका आना जाना तनासुख के अतिरिक्त और कुछ ठहरही नहीं सकता। जिस खुदाकी वन्दना जो कोई करता है वह देवता पूर्वके प्रेमके कारण सर्वदा यथाशक्ति अपने पूजनेवालेकी सहायता किया करता है। जिस योनिमें वह जाता है वहाँही रक्षक होता है।
राजा विपश्चितका उदाहरण-वसिष्ठपुराणमें इस प्रकार एक कहानी लिखी है कि, विपश्चित नामक एक बड़ा राजा था। वह राजा अग्नि देवताकी पूजा किया करता था। एकबार ऐसा हुआ कि, चारों ओरसे उसके बैरी चढ़ आये उनकी सैन्य चारों ओर से उन्हें देखकर घबरायी। आगका एक कुण्ड बनाया और भली भाँति अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपना शिर तथा शरीर पृथक् पृथक् करके डाल दिया। जब उसने अपना शिर और शरीर अग्निदेवताको हवन दिया तो वो दयालु हुआ, उस एक विपश्चितके चार विपश्चित होकर उस अग्निकुण्डमें से बाहर निकल पड़े, वे चारों बड़े बलिष्ठ साहसी तथा प्रतापशाली थे। उनके तेज के सामने किसी बैरीको ठहरनेका साहस नहीं हुआ। जैसे कि, शेरके सामनेसे भेड़ोंका गोल भागता है उसी प्रकार उसके सामने कोई बैरी न ठहरा। वे चारों