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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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हुई देखा था । इससे प्रमाणित हुआ कि, दाऊद न आकाश पर गया न पृथ्वीपर जीवित रहा और न कन्नमें रहा वह अवश्यही समस्त संसारके पथमें गया, उसका आवागमन हुआ ।

१८-मतीकी इञ्जीलमें आवागमन-मतीकी इञ्जीलका (१२) बाब (४६) से (४५) आयत तक उसमें लिखा है कि, जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीर से निकल जाती है । तब सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है, जब जगह नहीं पाती तब कहती है कि, मैं अपने घरमें जहाँ से निकली हूँ पुनः जाती हूँ । जाती है जब उसको देखती है कि, वह खाली और साफ है । तब वह सात आत्माओंको जो उससे अधम हैं अपने साथ ले आती है वे भीतर जाकर स्थिर हो जाती हैं । इस समय मनुष्यकी पिछली दशा अगली दशासे बुरी हो जाती है ।

अब इन आयतोंका तात्पर्य मैं अक्षर अक्षर लिखता हूँ । जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीरसे निकल जाती है तथा सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है । इसका तात्पर्य यह है कि, मृत्युके मूच्छाके पीछे इसलिये कि, आत्मा पवित्र होनेके कारण है । उसका स्थान तथा श्रेणी ऊँची है इस कारण यह ऊपरको चलती है, सूखे स्थानसे यह तात्पर्य है कि, जहाँ तरी तथा गीलापन कुछ न हो । आकाश इत्यादि की उँचाईमें जाकर अपने लिये विश्रामका स्थान दूँदती है । परन्तु वह तो विश्राम का स्थान नहीं । वह तो शून्य है । आत्माके निमित्त तो कोई अवश्यही शरीर चाहिये । शरीरके लिये कोई भूमि और भूमिके लिये बस्ती होनी चाहिये । बस्तीके लिये कुछ जल जिसमें जीवोंका भरणपोषण हो । बिना भोजनके किसी जीवकी स्थिति नहीं । ये एक दूसरेका भोजन होते हैं । समस्त स्वर्गों तथा वैकुण्ठोंमें बस्ती हैं । इस अपवित्र आत्माको तो वहाँ स्थान नहीं मिलता । न यह वहाँ जाही सकती है । इस कारण यह अपवित्र आत्मा सूखी जगहोंमें अपनी स्थिति दूँदती है । क्योंकि, अपवित्र आत्मा तो वैकुण्ठमें जा न सकेगी, सूखी जगहोंमें आनन्द नहीं मिलता ; जब शून्यमें स्थान नहीं मिलता तब कहती है कि, जहाँसे मैं निकली हूँ फिर वहाँ जाऊँगी । जब आती और उसको देखती है तब उस स्थानको स्वच्छ तथा साफ पाती है इससे यह तात्पर्य है कि, वह आत्मा जब अपने मृतदेहके निकट आती है तब देखती है कि, मेरा शरीर अब मेरे रहने योग्य नहीं, वह स्वच्छ तथा झाड़ा और खाली है, क्योंकि शरीरकी सहायक चौदह इन्द्रियाँ और उनके चौदह देवतें पाँच तत्व और तीन गुण कुछ न रहे, इन साथियों बिना इस शरीरमें मेरी स्थिति कैसे हो सकती है ? वह जो कल बनी थी वो बिगड़ गयी । वह घर उजड़ गया । केवल मिट्टीका एक स्थूल भाग रह गया है । उसको कोई गाड़ दे अथवा जलादे उसके

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