कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 813, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै तब कुकर्मं सुकर्मंका हिसाब देता है पर स्वप्नावस्थाका हिसाब किताब नहीं होता । क्योंकि, मनुष्य जागृतवस्थामें अधिकृत है । इसीसे उसका लेखा होगा, पशु स्वप्नावस्थामें है इससे उनका हिसाब न होगा । ये चारों अवस्था जीवके भ्रम तथा अज्ञानको हैं । इन्हींमें बँधा हुआ यह आवागमन किया करता है । ईश्वर तथा जीव इन चारों अवस्थासे पृथक नहीं । पूर्वोक्त संन्यासी जब संन्यासी था तब भी चारों अवस्थामें फँसा था । जब वह बहुत बड़ा तपस्वी साधु तथा महादेवजी हो गया तब भी चारों अवस्थामें फँसाही रहा । इन चारों अवस्थासे जीव छूटा न शिव छूटा । पर वही छूटा जिसको स्वयम् सत्यगुरुने छुड़ाया । शेष सब आवागमनमें रहे । इन चारों अवस्थाकी विद्या अर्थात् सत्यज्ञान भूमिका और इन चारोंके सब कार्य, भ्रम तथा अज्ञानरूप उस विद्यार्थी तथा पादरीके समान हैं । यह कुछ करता नहीं और सब कुछ करता है । ज्ञानी वही है कि, जिसने भली भांति देख लिया और अन्तर दृष्टिसे जान लिया, क, मैं कैसे करता हूँ और कैसे नहीं करता ? उसने अहंकार छोड़ दिया और जब अहंकारको छोड़ दिया तब सब कुछ छूट गया ।
७३—आत्मा बादशाह है और चौरासी लाख योन उसका राज्य है । यह मणिमाणिक जड़ें महलोंमें रहता है और कभी कभी उजाड़ जंगल तथा बयाबानमें जा बैठता है । स्थान परिवर्तनके निमित्त यह दूसरा कुछ कदापि नहीं बनता । जो हो यह वही, राज्य राज्येश्वर तेजोमय शाहंशाह है । जो मनुष्य, पशु, स्थावर, जंगल सबमें एकही आत्मारूप है । पशु मनुष्यसे किसी बातमें कम नहीं । केवल आकारोंकी विभिन्नता है । सब बात एकही हैं कुछ विभिन्नता नहीं ।
७४ स्वाभाविक चेतना—प्राकृतिक नियम सब जीवोंमें समान रूपसे उपस्थित है, उसके लिये पिता तथा शिक्षकका कोई प्रयोजन नहीं है । जब बालक उत्पन्न होता है तो आपसे आप अपनी माताके स्तनोंको पकड़कर चूसने लग जाता है । आपही अपना करता है । सिखलाने तथा पढ़ानेकी कोई आवश्यकता नहीं होती । जिस योनिमें जाता है आपसे आप उस योनिका कार्य करने लग जाता है क्योंकि, यह सब योनियोंके स्वभाव तथा कर्मसे भली प्रकार अवगत है । सबका अनुभवी तथा अभ्यासी है । क्योंकि, सब योनियोंमें यह फिर चुका है । सबका जाननेवाला है । कुछ सिखाने पढ़ानेकी आवश्यकता नहीं रखता । सब जीव आपही आप वही गुण रखते हैं । पर चारों अवस्थाओंने उसको भुला दिया । स्त्रियोंको देखो कि, वह ऐसी मक्कारी (कपट) करती हैं । कि, पुरुषों-