भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 817

देखे थे, जिनका मुँह ताजी कुत्तेकासा था बाकी शरीर मनुष्योंकासा है ॥१३॥

अश्वमुख—एक प्रकारके मनुष्य हैं जिनका मुँह घोड़ेकासा और देह आदमीकी होती है ॥ १४ ॥

पचास गजका मनुष्य—सिकन्दर बादशाहने एक मनुष्य देखा जो पचास गज ऊँचा था । उसके शिरमें गायके समान दो सींगें थीं, वह मनुष्योंको पकड़ पकड़ कर खाता था । सिकन्दरशाहने उसको तीरोंसे मार डाला ॥ १५ ॥

एक टांगके मनुष्य—एक प्रकारके मनुष्य हैं कि, उनके एकही पाँव एकही हाथ एकही कान और एकही आँख है । मानों वे एक मनुष्यके आधे हैं । अनगिनती प्रकारके बिचित्र आकारवाले जीवधारी हैं । जिनके देखने सुनने से मानुषिक बुद्धि चकराती है । चौरासी योनिके जीवोंमें अनगिनती रङ्ग ढङ्ग हैं । सबका स्वरूप तथा स्वभाव न्यारा न्यारा है । इस सृष्टिकी सीमा नहीं । इसका वर्णन असम्भव है । परमेश्वरकी सृष्टि और उसके कौतुकका भेद कौन पा सकता है ? सारे जीव अपने पूर्व कर्मोंके अनुसार यहाँ वहाँ आवागमन कर रहे हैं । नाचते फिरते हैं बड़ा बाजीगर सबको नचाता फिरता है ।

तात्पर्य—इन बातोंके लिखनेसे मेरा यह है कि बुद्धिमान लोग समझे बूझेंगे कि, मनुष्य किसको कहते हैं पशु कौन है । मनुष्यका केवल वही स्वरूप तथा स्वभाव है । जिसके द्वारा अपने यथार्थको जान ले, शेषके सारे पशु हैं । एकही आत्मा सबमें आवागमन करती है । केवल अपने कर्मों ने स्वरूप तथा स्वभाव बदल डाला है । मन वचन और कर्म करके जैसे कर्म जिस जीवसे होते हैं वैसेही स्वरूप और अवस्थामें पुनः देह धरकर प्रगट होते हैं । सहस्रों प्रकारके बन्दर मनुष्योंके रूपके हैं । जिनमें विवेक नहीं हो सकता कि, यह सब मनुष्य हैं अथवा बन्दर हैं । कितने मनुष्य जो जङ्गलोंमें रहते हैं वे बन्दर समझे जाते हैं परन्तु वास्तवमें वे मनुष्य हैं पर वे मनुष्यतासे पृथक् हैं । सहस्रों प्रकारकी मूर्तियाँ आधे मनुष्य तथा आधे पशु रूपमें हैं पृथिवी तथा आकाशोंमें भरी हुई हैं इस सृष्टिका अन्त नहीं है । देहोंका निर्माण भी कर्मोंनेही किया है इन सबके चित्र प्रथममें दिये हैं । पूर्वके उपदेशको निम्न लिखित नजममें कहते हैं—

जो देखे स्वसम्बेद सद्गुरु की साख । कहे आदमी योनि हैं चार लाख ॥
यह पहचान इनसानकी सारी जात । वही आदमी है जो हो वासिफात ॥
दरोग और बातिलका जिसमें तमीज । वही आदमी हैं सो हरदिल अजीज ॥
वह सरताज हरजुमरेः सिलकत तमाम । इसीके लिये सारे दारुसलाम ॥
जो झूठ और सच जाने इनसों वही । हैं बाकी सो हैवान या अबलही ॥