कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 822, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ें१५—हाथी गोपालदास—भक्तमालमें लिखा है कि, रामानुजस्वामीके ऊपर एक राजाने रुष्ट होकर हाथी छोड़ा कि, आपको मार दे। जब वह स्वामी जीके समीप आया तो आपने उसका कान पकड़ कर कहा राम कृष्ण। वह हाथी स्वामीजीका शिष्य हो गया स्वामीजीके चरणों पर शिर झुकाके बैठ गया। राजा जब उसको अपने पीलखानमें ले गया उस समय उसने दाना चारा छोड़ दिया पर रामानुज स्वामीके पास आनेपर दाना चारा खालिया। राजाने विवश होकर आज्ञा दी कि, इसको गरमी हो गई है इस कारण नदीमें गोता लग-वाओ। उस हाथीका नाम स्वामीजीने गोपालदास रखा था। जब गोपालदासको राजाने नदीमें गोता दिया तो वह समझ गया कि, राजा मुझको बहुत दुःख-देता है। उसने पानीमें गोता मारकर देह त्याग दी। जाना गया कि, गोपालदास शरीरत्याग कर असहाब कहफके कुत्तोंकी तरह उत्तम अवस्थामें प्राप्त हुआ। असहाब कहफके कुत्तोंसे गोपालदासकी मर्यादा कदापि कम नहीं बरन् अच्छी जानी जाती है। क्योंकि, उसने वैष्णव धर्म में आकर शरीर त्याग किया था यह भी बात है कि, जलके भीतर समाधि लगाकर देह छोड़ा, इस कारण उसका परिणाम अच्छा होगा।
१६—ग्यारहवां द्वार—कबीर साहब कहते हैं कि, दश द्वारका पता सबको है पर ग्यारहवां द्वार पारखगुरुकी दयासे मिलता है। दशद्वारसे जब तक प्राण जाया करते हैं तब तक इसका आवागमन बन्द नहीं होता।
१७—मोक्षका अधिकारी स्वसंवेदमें कबीर साहबका कथन देखो उन्होंने कहा है कि, दो प्रकारके ज्ञान हैं एकको ज्ञान तथा दूसरेको जान कहते हैं। ज्ञान निर्विकार है और जान विकारी है। ज्ञानको स्थिति तथा जान का विनाश है। इन्हीं दोनों प्रकारके ज्ञानोंमें समस्त जीव हैं। जिसको ज्ञान हुआ वह तो निर्वि-णको प्राप्त हुआ पर जिसमें जान है वह आवागमनमें है। इन दोनों ज्ञानोंका भेद पारख गुरु बिना दूसरा नहीं बता सकता, जितना कुछ कहा सुना जाता है वो सब मायाके घेरेके भीतर है वह सब जानके आधीन है। जब ज्ञानपर अंधेरा आ जाता है वह जान कहलाता है। जब स्वच्छ तथा निर्दोष है तब ज्ञान है। कोई सहस्रों युक्तियां क्यों न करे बिना स्वसंवेदकी शिक्षाके ज्ञान प्राप्ति की युक्ति हाथ न लगेगी।
लिखनेका कारण—यह थोड़ीसी बात जो मन लिखा वह आवागमनसे विमुखबालोंके लिये हैं। क्योंकि, आवागमनके न माननेसे अन्तःकरण अशुद्ध