भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अशॉफियोंको उठाकर अलग रख दिया कहा कि, मैं तेरी दक्षिणा स्वीकार नहीं करूँगा वह सर्प लौट गया। फिर दश अशॉफियां लाकर पुरोहितके सामने रखवीं पर वह प्रसन्न नहीं हुआ कहने लगा कि, मेरा यजमान बहुत धनाढ्य है उसने मुझको कभी कुछ नहीं दिया मैं इतनेमें मैं उससे प्रसन्न नहीं। अनेक सर्प उस पुरोहित की खुशामद करने लगे अन्तमें यह बात बादशाहके सामने उपस्थित हुई बादशाह की आज्ञा पाकर पुरोहितने उनकी बारह अशॉफियां स्वीकार करली सभी सर्पोंके दक्षिणा देचुकनेके बाद सबेरा होते ही बादशाह दूध पीके चला गया इसके पीछे सभी सर्पोंने दूध पी २ कर अपनी अपनी राह ली। सबेरे सर्पोंके ब्राह्मणने राज-पुतानेके ब्राह्मणको कुछ रुपये साथ अशॉफियां देकर बिदा किया कहा कि, तुम्हारे देशमें भी हमारा एक यजमान राजा रहता है। हम आज तक उसके पास कभी नहीं गये। वह नारनोल नगरके ढोसी पर्वतमें रहता है।

ढोसीपर्वतका नागराज - योगियोंने जान लिया कि एक अत्यन्त बलिष्ठ सर्पराज ढोसीके पर्वतमें रहता है। एक योगीने चाहकि, मैं किसी प्रकार उस सर्पको पकड़ूँ। उस पर्वत पर जाकर मंत्र पढ़कर बीना बजाने लगा। उस सर्पने एक ऐसी फुँफकार मारी कि, योगी राखका ढेर हो गया इसके पीछे उस योगीकी स्त्रीने विख्यात किया कि, जो कोई इस सोंपको पकड़े तो मैं उसकी अपनी दो पुत्रियां और बहुतसा धन दूँगी। इसी लालचसे अनेक योगी एकत्रित हुये। कच्चे बरतन पर्वत पर चुन दिये। मंत्र पढ़ना आरम्भ किया। उस सांपने फिर एक फुँफकार मारी सारे कच्चे बरतन लाल होगये। इस प्रकार योगियोंने अनेकों युक्तियां की पर वह सोंप न पकड़ा गया।

ग्रन्थकारकामत - मैंने अपने पितासे बचपनमें इस प्रकारके सांपोंके राजा की बातें सुनी थी पर उस समय मुझमें कुछ भी समझ नहीं थी, इस कारण वे बातें कहानी समझलीं पर अब सत्य जान पड़ती हैं क्योंकि, वस्तुतः सांपोंमें राजे तथा धनाढ्य लोग हैं उनके पुरोहित भी होते हैं जिनको कोई दूसरा धन्धा नहीं होता। केवल सांपोंसे धन लेकर अपना गुजारा किया करते हैं। सर्पोंकी अनेक जातियां हैं। उनकी आयु बड़ी होती है। उनमें सिद्ध होते हैं, मैंने सुना है कि, जब सर्प सहस्र वर्षका हो जाता है तो उड़कर मलयागिरि पर्वतपर चन्दनके वृक्षमें लिपट जाता है। कुछ कालतक उसमें लिपटा रहता है, उसके पीछे उसमें सिद्धि हो जाती है वह नाना प्रकारका स्वरूप बना सकता है। अपनी देह पलटकर मनुष्य आदिका स्वरूप धारण कर सकता है।

बालरूपीका वीनप्रेम - मैंने एक कहानी सुनी थी कि, एक पाठशालामें

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