भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 892

ने कच्चे बरतने लाकर उसकी बाम्बीके मुँह पर रख कर मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया सर्प पर मन्त्रका प्रभाव होतेही उसने फूँफकार मारी बरतन लाल हो गये। योगियोंने उन बरतनोंको हटाकर दूसरे बरतन बांबीके मुँह पर रख कर मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया, सर्पने फिर फूँफकार मारी, बरतन अधकच्चे रह गये। योगियोंने बरतन हटाकर कच्चे बरतन वहाँ रखे मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया। फिर उसने फूँफकार मारी तो बरतन ज्योंके त्यों कच्चे रह गये एक भी नहीं पका। उन लोगोंने जान लिया कि, अब उस सर्पका विष दूर हो गया। इसके पीछे वे लोग सांपको पकड़ पिटारीमें रख कर मकान ले गये।

स्त्री बननेवाली नागिन — एक दिन ऐसी घटना हुई कि, उस बिलके समीप एक जर्मीदार चला जाता था। उसने देखा कि, एक स्त्री बिलपर बैठी रो रही है, उस जर्मीदारने पूछा कि, तुम क्यों रोती हो, स्त्रीने उत्तर दिया कि, मैं नागन हूँ, मेरे भाईको योगी पकड़ लेगये हैं मैं उसकी जुदाईसे रोती हूँ। यदि तू मेरे भाईको छुड़ाकर मेरे पास ला दे तो मैं तुझको बहुतसा धन दूँ। नागन जर्मीदारको एक स्थानपर ले गई। उजाड़की जगह दिखाकर कहा कि, कमर भर नीचे खोदकर खजाना निकालो। जर्मीदारने कमरके बराबर खोदा बहुत धन पाया वह बहुत प्रसन्न हुआ। नागनने कहा कि, मेरे भाईकी यह पहचान है कि वह बहुत मोटा सांप है, योगीके पास जितने सर्प हैं किसीके माथे पर तिलक नहीं पर मेरे भाईके माथे पर तिलक है। यही उसकी पहचान है। अन्तमें जर्मीदार योगियोंकी खोजमें लगा, जहाँ वह सांप था उस योगीके पास गया। उस सांपको पहचान कर वह उसी योगी की सेवा करने लगा, जब कुछ दिन सेवा कर चुका तो एक दिन अवसर पा सांप की पेटारी ले भागा, उसी बिल पर आ पहुँचा। नागनको पुकारा, वह स्त्री बिलसे बाहर निकल पड़ी जर्मीदारने उस सांपको छोड़ दिया। नागन अपने भाईको देखकर अत्यन्त हर्षित हुई आप भी सांपन होगई, पीछे अपने भाईके साथ बिलमें समा गई। वह सांप योगियोंके पञ्जेसे छुटकर कहींका कहीं चला गया। जिस गांवमें यह घटना हुई थी उसी समयसे उसका नाम कबरबच्छा रक्खा गया। क्योंकि, उस सांपके जन्में हुए सारे बछड़े चितकबरे थे उनकी आंखें सांपोंकी तरह गोल थीं।

यमदूत — कुछ वर्ष बीते एक हलकारा बीकानेरराज्यसे अलवरराज्यको जाता था, उस प्रान्तकी भूमि बहुत उजाड़ तथा बीहड़ है। दूर दूर पर गाँव है। बरसातका मौसम था, घास अधिक उत्पन्न हुई थी, इतनी बड़ी बड़ी घास हो गई थी कि, जिसमें मनुष्य छिप जावे। घासोंके कारण राह भी छिप गई थी। हलकारा विवश हुआ, कहीं राह न मिलती न कोई मनुष्यही दिखाई देता कि, उससे पता