भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पर सवार होकर चला गया । उसके पीछे बिच्छुओंकी सारी फौज उसके पीछे चली, सब अपने २ सकानको गये, एक बिच्छु भी उस जगह नहीं रहा । उनके जाने पर नौव्वाबके सेवकोंने उस देगको उलट कर देखा वह सौंपसहित राखका ढेर हो गया था ।

रेशमका कीड़ा ।

बीटन साहबकी नेचरल डिक्शनरीमें एक प्रकारके रेशमी कीड़ेका वृत्तान्त लिखा है कि, रेशमी कीड़ा पहले चीन देशसे आया, यह मल.ईकी तरह श्वेत वर्णका होता है इसका रंग शीघ्रही बदल जाता है । उसका भोजन वृक्षोंकी पत्तियों हैं यह छः सप्ताहमें पूरी अवस्थाको पहुँच जाता है, बीच बीचमें चार पाँच बार अपना रङ्ग बदलता है फिर सुस्त हो जाता है कुछ खाता नहीं फिर इसका रङ्ग भूरा होता है; चार पाँच बार रङ्ग बदल चुकनेके बाद डेढ़ इञ्चसे लेकर दो इञ्चतक लम्बा हो जाता है । दस दिनतक बहुत खाता जाता है, जिससे मोटा तथा बड़ा होता जाता है । समय बीत जानेपर ढाई इञ्चसे लेकर तीन इञ्च तक हो जाता है उस समय भोजनकी कामना घट जाती है, पत्तियोंको कुतर २ कर पृथिवी पर डाल देता है भोजनादि छोड़कर बेचैन हो जाता है, जिस समयसे अपना भोजन छोड़ देता है उस समयसे पतला रेशमी कपडासा बनाता है । उसकी देह पतली और नरम होनेके साथ स्वच्छ तथा उज्ज्वल होती जाती है, प्रायः तीन चार दिनोंमें बहुत सुन्दर रेशमी परदे तयार होते हैं वे गोल गोलीके समान होते हैं । रेशमी गोलियों कोई सूतके रङ्गकी, कोई सुनहरी, कोई फूलके रङ्गकी और कोई श्वेत होती है । इस कठिनपरिश्रमसे निवृत्त होते ही यह अपना चर्म एकवार छोड़ता है उसका पहला स्वरूप बदल कर गोल हो जाता है । उस अवस्थामें दो अथवा तीन सप्ताह रहता है इसके पीछे परदा फट जाता है उसका स्वरूप और ही ढङ्गका हो जाता है, उस समय कीड़ा अपने मुखसे एक प्रकारका गोंदके समान पतला पदार्थ निकालता है—उसमें केवल तार ही तार होते हैं, वे छः सौ फीटसे सहस्र फीट तक लम्बे होते हैं । रेशमी कीड़ा सारे कीड़ोंका राजा होता है, राजों तथा रहीसोंकी तरह बार बार कपड़े बदलता रहता है ।

गिरगिट ।

इस प्रकारका एक गिरगिट भी मैंने देखा कि, वह अपना रङ्ग बदलता