भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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चपट जाती है कि उनको जान नहीं पड़ता समस्त रक्त चूस लेती है वे निर्जीव हो जाते हैं। जब वह उनका रक्त चूसती है तो अपने परोंमें पड़्डा करती जाती है, जिसमें कि वह जीव नितान्तही अचेत हो जाये। उसके दातोंकी तनिक भी घाव नहीं जान पड़ता। प्रायः घोड़ेकी श्रीवाका रक्त इस प्रकार पी जाती है कि, उसको तनिक भी सुधि नहीं होने पाती। सबेरे देखो तो उनकी गर्दन रक्तसे भरी जान पड़ती है।

गायनाकी चमगिदड़ी—बड़ीही विचित्र होती है। इसका नियम है कि, वह जहां कहीं मनुष्यको सोते पाती है अत्यन्त धीरेसे उसके पाँवके निकट उतरती है। सोनेवालेको तनिक भी सुध नहीं होती अँगूठेमें ऐसा छेद कर देती है कि, सूईकी नोंकसे भी बहुत बारीक होता है। उसी छिद्र द्वारा रक्त पीती है अपने परोंसे पड़्डा करती जाती है जिसमें वह मनुष्य नितान्तही अचेत हो जाये। उसका रक्त पीना अपने परोंसे पड़्डा करनाही मानो उसका मंत्र और जादू है। रक्त पीकर उसका पेट मशकके समान फूल जाता है वह दूर जाकर कँ कर देती है फिर आकर पीने लगती है फिर पेट भर जाता है तो दूर जाकर कँ कर देती है। इसी प्रकार प्रत्येक क्षण वह मनुष्य अचेत होता जाता है। अन्तमें शरीरका समस्त रक्त पी लेती है जिससे वह मनुष्य वहीं मर जाता है। मनुष्यके अँगूठे तथा पशुवोंके कानमें जो बहुत रक्त चलनेका स्थान है वहांही वह लगती है उसमें ऐसी बुद्धि तथा युक्ति है कि, किसीका कुछ वश नहीं चलता। वेदके उपनिषदोंमें लिखा है कि, पहले प्राण मनुष्यके अँगूठेके मार्गसे घुसा था। शायद इस चमगी-दड़ीको वह स्थान मालूम है। उसी मार्ग द्वारा रक्त खींचती है। रक्तके साथ ही प्राण है। रक्त जल है, वायु प्राण है। जब वायु और जल दोनों गये तो जीवित कँसे रह सकता है।

फाखता या पण्डुक।

फीरोजपुर जिलाके मुक्तसर गांवमें साहबू नामका एक मनुष्य रहता था जो जातिका रोड़ा था। एक दिवस वह मेरे पास आया मैंने उसको शिक्षा दी कि, तुम मांस न खाना और मदिरा पीना छोड़ दो, ये बहुत पापकी बात है। उसने कहा कि, मैं खाता पीता तो हूँ पर प्राणबध नहीं करता। क्योंकि, मैंने एक दिन बन्दूकसे दो फाखता मारा, उनको पकाकर खा लिया। उस दिन मुझको स्वप्न हुआ तो मेरे कानोंमें ऐसा शब्द सुनाई देने लगा कि, हम दोनों साधु फाखताके स्वरूपमें इस देशका भ्रमण करने आये यह निर्दयी कसाई हमको मारकर खा गया। जब साहबूरोड़ाने ऐसा स्वप्न देखा तो प्रतिज्ञा की कि,

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