भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अगस्त्यब्रह्मिणे देवताओंकी प्रार्थनाको स्वीकार किया । देवता बड़े प्रसन्न हुये । अपने २ स्थानको गये । पीछे मुनि अपनी स्त्रीसे कहने लगे कि, प्रिये ! यह महान् अनर्थकारक विघ्न उपस्थित हुआ है, पुरातन मुनियोंने कहा है कि, मुमुक्षुओंको काशीवासमें विघ्न भी बहुत होते हैं । काशीमें निवास करते वही विघ्न मुझे भी उपस्थित हुआ है । इस प्रकार अपनी पत्नीसे कह गंगामें स्नान कर, सब देवताओंका दर्शन कर, स्त्रीसहित काशीसे बिदा हुये । काशीके विरहसे सन्तप्त हो बारंबार काशीका स्मरण करते, तपके बलसे अल्प कालमेंही भृंगोंको उठाये हुये विध्या पर्वतके पास पहुँच गये । अपने पास खड़े हुये मुनिको देख पर्वत कंपायमान होगया सूक्ष्म हो दण्डवत करने नीचे झुकर पृथ्वीका स्पर्श करने लगा । अगस्त्यजी भक्तिभावसे पृथ्वीमें दण्डवत करते हुए विन्ध्य पर्वतको देखकर, अति प्रसन्न हो कहने लगे कि, हे वत्स ! मैं तुम्हारे उच्च शिखरों को नहीं उलंघ सकता, इस कारण जबतक मैं न आऊँ तबतक तुम योंही स्थित रहो । पीछे उसके शिखरोंको लांघते हुवे दक्षिण दिशाको चले गये । विन्ध्याचल उसी प्रकार पड़ाही रह गया ।

गंगाजीकी कथा ।

इसी प्रकार देवीभागवतके ९ स्कन्धमें नदियोंकी बहुतसी कथा हैं । प्रथम गंगाजी गोलोकमें कृष्ण भगवान् के पास थी, एक समय राधाजी भगवान् कृष्णको गंगाजीसे बात करते देखकर क्रोधित हुई उसीके भयसे गंगाजी कृष्णजीके चरणोंमें लुप्त हो गई ।

गंगाजीके लुप्त होते ही जल सूख गया, सर्व प्राणी जलके अभावसे दुःखी होने लगे, देवताओंसहित त्रिदेवतोंने कृष्णजीके निकट जाय बहुत विनय करके कृष्णजीके चरणोंसे गंगाको प्रगट कराया, पीछे विष्णु भगवानसे विवाह हुआ । किसी कालमें ब्रह्मलोकमें किसी राजापर मोहित होनेके कारण ब्रह्माजीके शापसे पृथ्वीपर स्त्रीरूपसे जन्मले शन्तनु महाराजकी भार्या बनी ।

शन्तनु महाराजसे विवाह होनेके समय गंगाजीने वचन लिया था कि, मेरे गर्भसे जो संतान उत्पन्न होगी उसे मैं लेलूँगी । राजा भी बाचाबन्ध हो गये । पीछे सात पुत्रोंको जन्म लेतेही गंगाने गंगामें डाल दिया पर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ तो महाराजने पुत्रके लोभसे मोहमें आकर कहा कि, यह पुत्र मैं तुम्हें न दूँगा । गंगाजी पूर्व वचनके अनुसार गंगामें प्रवेश कर गई । वेही गंगाजीके आठवें पुत्र महान् प्रतापी भौमविजयी भीष्मपितामहके नामसे प्रसिद्ध हुये, जिनकी कथासे महाभारतादि इतिहास पुराण भरे पड़े हैं ।