भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

दूसरी व्याख्या इस प्रकार है—

वेदोंका विषय तीन गुणोंका कार्य है अथवा तीन गुण और उनके कार्योंके प्रकाशक वेद हैं। अभिप्राय यह है कि, तीन गुणोंके अन्दर ही अन्दर वेदोंका कथन है। जितना उपदेश संसारमें होता है, वह सब इन्हीं तीन गुणोंके भीतरही भीतर हो सकता है। क्योंकि जो वाणीकी आज्ञा है सो सब तीन गुणोंका ही कार्य हो जाता है। वाणीकाही क्या ? मनकाभी विषय मायाकेही अन्तर्गत है। “गो गोचर जहँ लग मन जाई । तहँ लगि माया जानहु भाई ॥” गुणातीत वस्तु अकथनीय अचिन्तनीय और निरूपदेश है, इसके लिये श्रुति स्वयम् कहती है “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” जहांसे वाचा सहित मन उसे न पाकर पीछे लौट आती है। इसी लिये मुण्डक उपनिषत्में वेद और वेदाङ्गको अपराविद्या कहा है।

जिस विद्यासे यथार्थ ब्रह्म न जाना जाय, न ठीक दर्शाया जासके, उसे अपरा विद्या कहते हैं और वेदोंमें प्रायः सांसारिक कामना युक्त, सकाम कर्मों और अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भादि) की ही पूजा वर्णित है। अपराविद्याकी हद्द यहाँही तक है। जो इस अपरा विद्या तकही ठहर जाते हैं वे परा विद्याको कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? और पराविद्याको पाये बिना त्रिगुणके जालसे कैसे छूट सकते हैं ? इसलिये हे अर्जुन ! तू ऐसी पुष्पित त्रिगुणात्मक वाणीवाले वेदोंसे सावधान हो, उनमें आसक्त मत हो। इत्यादि ॥

इसी प्रकारसे गीताके अनेक भाष्यकारोंने अपनी अपनी युक्ति प्रयुक्त द्वारा अनेक प्रकारसे इसका अर्थ किया है किन्तु, वेदके त्रिगुणात्मक होनेमें सब एक मत हैं। कइयोंने तो आत्मतत्वकी प्राप्तिके लिये त्रिगुणात्मक वेदोंका सर्वथा-ही त्याग बतलाया है।

आधुनिक प्रसिद्ध टीकाकारोंमें लोकमान्य तिलक अपनी टीकामें क्या लिखते हैं, यह भी दिखाता हूँ ॥

देखो लोकमान्य तिलककी टीका गीताके श्लोक ४३-४४-४५ तीसरा अध्याय ॥

(४२) हे पार्थ ! (कर्मकाण्डात्मक) वेदोंके (फलश्रुति फल) वाक्योंमें भूले हुए और यह कहनेवाले मूढ़ लोग कि, इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है बढाकर कहा करते हैं कि, (४३) “अनेक प्रकारके (यज्ञ-याग आदि) कर्मों-, सेही (फिर) जन्म रूप फल मिलता है और (जन्म जन्मान्तरमें) भोग तथा ऐश्वर्य मिलता है” स्वर्गके पीछे पड़े हुए वे काम्य बुद्धिवाले (लोग) (४४) में