BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 977 of 1367

Read in context
Page 977

पापकी कमाई है। यदि इनको छोड़ जाऊगा वा किसीको दे जाऊगा तो भोगने-वाला भी मेरेही समान कष्टमें पड़ेगा, उस समय उसका प्राण निकल गया ।

अभक्ष्यपर कबीर साहिब ।

अभक्ष्य निषिद्ध एवं घृणित पदार्थोंके विषयमें कबीर साहबकी अनगिनित साखिया तथा अनन्त शब्द प्रचलित हैं उनमेंसे थोड़ासा यहां भी लिख देता हूँ जिससे लोग जान जायें कि, कबीर जैसे निष्पक्षपातीभी इसको कितनी बुरी दृष्टिसे देखते थे ।

कबीर— मांस अहारी मानवा, प्रत्यक्ष राक्षस जानि ।
ताकी सङ्गति मति करो, होय भगतिमें हानि ॥ १ ॥

कबीर— मांस खायते ढेर सब, मद पिये ते नीच ।
कुलकी दुरमति परिहरै, राम भजेतेँ ऊँच ॥ २ ॥

कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर नरकहिं जायंगे, माता पिता समेत ॥ ३ ॥

कबीर— मांस मछरिया खात हैं, सुरापानसे हेत ।
ते नर जड़से जायँगे, ज्यों मूलीका खेत ॥ ४ ॥

कबीर— मांस खाय अरु मद पिये, धन विपसा जो खाय ।
जुआ खेल चोरी करे, अन्त समूला जाय ॥ ५ ॥

कबीर— मांस मांस सब एकही, मछली हिरनी गाय ।
आँख देखि जो खात हैं, सो नर नरके जाय ॥ ६ ॥

कबीर— ब्राह्मण राजा चार वरणके, और कौम छत्तीस ।
रोटी ऊपर माछली, सभी वरण गये खीस ॥ ७ ॥

कबीर— कलियुग केरे ब्रह्मणा, मांस मछरिया खाँय ।
पाय लगे सुख मानही, राम कहे मर जाँय ॥ ८ ॥

कबीर— पाँव पुजावैं वैठिके, भखें मांस मद दौय ।
तिनकी दीक्षा मुक्ति नहीं, कोट नरक फल होय ॥ ९ ॥

कबीर— सकल वर्ण एकत्र है, शक्ति पूजि मिलि खाहिं ।
हरिदासनकी भ्रान्ति कर, केवल यमपुर जाहिं ॥ १० ॥

कबीर— विष्ठाकी चोका दिये, हांडी सीझे हाड़ ।
छूत बरावे चामकी, इनहुँका गुरु रौड़ ॥ ११ ॥

कबीर— जिव हिंसा किये, प्रगट पाप शिर होय ।
निगम पुण्य स्थाप ते, देखि न आया कोय ॥ १२ ॥