कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 978, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर— जीव नहीं हिंसा करे, प्रगट पाप शिर होय ।
पाप सभी सो देखिया, पुण्य न देखा कोय ॥ १३ ॥
कबीर— तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान ।
काशी करवट ले मरे, तौ भी नरक निधान ॥ १४ ॥
कबीर— हँसा हो सोही हँसे, गावे जान खजान ।
कर गहि चोटा तानसी, साहबके दीवान ॥ १५ ॥
कबीर— काटा कूटी जे करें, ते पखण्डको भेस ।
निश्चय राम न जानि हैं, कहैं कबीर सँदेस ॥ १६ ॥
कबीर— बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल ।
जो बकरीको खात है, तिनको कौन हवाल ॥ १७ ॥
कबीर— आठ वाट बकरी गई, मांस मुल्ला गा खाय ।
अजहूँ खाल खटिक घर, विहिश्त कहाँ को जाय ॥ १८ ॥
कबीर— अण्डा किन बिसमिल किया, घुन कीस किया हलाल ।
मछली किन जब्बह किया, सब खाने क्या ख्याल ॥ १९ ॥
कबीर— काजी तुझे करीमका, कब आया परमान ।
घट फोरा घर घर किया, साहब केर निशान ॥ २० ॥
कबीर— काजीका बेटा मुआ, उरमें साले पीर ।
वह साहब सबका पिता, भला न माने बीर ॥ २१ ॥
कबीर— पीर सबनकी एकसी, काजी जाने नाहि ।
अपना गला कटायके, विहिश्त बसे क्यों नाहि ? ॥ २२ ॥
कबीर— मुरगी मुल्लासे कहे, जबह करत हैं मोहि ।
साहब लेखा मांगसी, शङ्कट परेगा तोहि ॥ २३ ॥
कबीर— काजी जीहू स्वाद वश, जीव हनत हैं, आय ।
चढ़ि मसजिद एके कहैं, क्यों दरगह सच होय ॥ २४ ॥
कबीर— काजी मुल्ला मरमियां, चले दुनीके साथ ।
दिलसे दीन निवारिया, करद लयी जब हाथ ॥ २५ ॥
कबीर— काला मुंह कर करदका, दिलसे दुई निवार ।
सब सूरत सुभानकी, अहमक मुल्ला मार ॥ २६ ॥
कबीर— जोर कर जो जबह करे, मुँहसे कहे हलाल ।
साहब लेखा मांगसी, तब होई कौन हवाल ॥ २७ ॥
कबीर— जोर किया सो जुलुम है, माँगे जबाब खुदाय ।