भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उल्लिखित भाषणकी ओरही उनके मन आकर्षित हो जानेसे, भोग और ऐश्वर्य-मैंही गर्क रहते हैं, इस कारण, उनकी व्यवसायात्मिका अर्थात् कार्य्य अकार्य्यका निश्चय करनेवाली बुद्धि कभीभी समाधिस्थ अर्थात् एक स्थानमें स्थिर नहीं रह सकती ।

(४५) हे अर्जुन ! वेद उस रीतिसे त्रैगुण्यकी बातोंसे भरे पड़े हैं इसलिये तू निस्त्रैगुण्य अर्थात् त्रिगुणोंसे अतीत, नित्य, सत्त्वस्थ और सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे अलिप्त हो, एवं योग क्षेत्र आदि स्वार्थोंमें न पड़कर आत्मनिष्ठ हो ।

इसी प्रकार सनातन धर्मावलम्बी और वेदान्ती आदि सभी टीकाकारोंने वेदको त्रिगुणात्मक बतलाकर उसके जालमें न पड़नेकी ताकीद की है । तो फिर इस कबीरमन्शूरमें स्वामी परमानन्दजीने जो वेदोंको सांसारिक अथवा प्राकृतिक कहा तो कौनसा अपराध किया । वेद जब स्वतः अपनेको अपरा विद्या कहते हैं तब उसी बातको दूसरा कहे तो बुरा माननेकी कोई बात नहीं है ।

स्वामी परमानन्दजीने अपने "कबीर कौमुदी" नामक ग्रन्थमें वेदकी बहुत बड़ाई की है । आपने साफ लिखा है जो संसारमें रहकर वेदको नहीं मानता वह संसारके सब कष्ट अपने ऊपर बुलालेता है हाँ ! मुक्तिके लिये संसार बन्धनसे छूटनेके लिये, सद्गुरुसे स्वसम्बेदको जानकर उसका अनुकरण करना आवश्यक बतलाया है । गुरुबोधमें राम रहस्य साहबभी कहते हैं—

"गृहधर्म बड खटपट, तामें रहू हुशियार ।

लोक वेदकी रीति सब, करू सहित विचार ॥"

आगे चलकर इसी कबीरमन्शूर ग्रन्थमें स्वामी परमानन्दजीने वेद और हिंदू धर्मकी इतनी स्तुति की है कि, आप साफ शब्दोंमें कहते हैं "हिंदू धर्मही एक ऐसा धर्म है कि, जो मनुष्यको सद्गुरुकी शरण प्राप्त करानेका अधिकारी बनाता है ।" कहाँतक कहें, यदि कोई पूर्वापरका विचार किये बिनाही किसी बातके अर्थ और भावको न समझे और अपनी अनसमझीसे दुःखी होवे तो कोई क्या कर सकता है ।

इसलिये कबीरमन्शूरके पाठकोंसे मेरा निवेदन है कि, वह पूर्वापर विचारें बिनाही, इस ग्रन्थके विषयमें, अपना विचार न बाँध बैठे इसे आद्योपान्त पढ़-जायें फिर उनको पता लगेगा कि, स्वामी परमानन्दजी वेदके प्रशंसक हैं या निन्दक ।

प्रायः कई लोगोंने स्वतः कबीर साहबको भी वेदका निन्दक लिखमारा