कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 982, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यास—योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।
कृष्णद्वैपायनः प्राह स्थावरत्वं स गच्छति ॥
अर्थ—जो अहिंसक पशु हिरन, शशा आदि इनको कोई अपने खानेके हेतु मारता है वह स्थावर योनिमें जावेगा ।
बृहस्पति—सन्तप्यते ततोऽजसं भजते च ददाति सः ।
मधुमांसनिवृत्तो यः प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥
अर्थ—जो आदमी मांस नहीं खाता, वह सर्वदा तप करता है यज्ञ और दान भी करता रहता है ।
वसिष्ठ—यावज्जीवति यो मांसं विषवत्परिवर्ज्यं येत् ।
वसिष्ठो भगवानाह स्वर्गलोकं स गच्छति ॥
अर्थ—आदमी जबतक जीवे तबतक मांस न खावे, विष जान कर त्याग दे. उसको स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी ।
जमदग्नि—यो भक्षयित्वा मांसानि स्वतश्चापि निवर्तते ।
जमदग्निर्महाहैनं सोऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥
अथ—जो कोई मांस खाता हुआ स्वयं विचार कर अथवा किसीके कहनेसे मांस भक्षण छोड़ दे मृत्यु पर्यन्त न खावे, वह अवश्य स्वर्गको जावेगा ।
शुक्र—रूपमारोग्यमैश्वर्यं कान्तिं स्वर्यानमेव च ॥
प्राप्नोत्यहिंसः पुरुषः प्राहैवमुशना मुनिः ॥
अर्थ—जो हिंसा नहीं करता वह संसारमें सुन्दरता, लक्ष्मी, आरोग्यता, विद्या आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न होता है, मृत्युके बाद स्वर्गको जाता है ।
पराशर—सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च ।
नोत्तमं प्राणदानाच्छ पराशरवचो यथा ॥
अर्थ—सोनादान, पृथिवीदान, गोदान ये सब श्रेष्ठ दान हैं, पर “जीवको न मारकर उसे प्राणदान देना” सबोंमें उत्कृष्ट है । यह पराशरजीका वचन है ।
इसी बातपर मार्कण्डेयजीकी भी साक्षी है —
स्वयंभू मनु—कर्मणा मनसा वाचा यो हंति न हि कश्चन ।
स मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
अर्थ—जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे किसी प्रकार हिंसा नहीं करता, वह सब प्राणियोंका मित्र कहलाता है ।
हत्याके दोषी—हन्ता' चैवनुमन्ता' च विश्वस्ता' 'कयविक्रयी' ।