भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 982

व्यास—योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।

कृष्णद्वैपायनः प्राह स्थावरत्वं स गच्छति ॥

अर्थ—जो अहिंसक पशु हिरन, शशा आदि इनको कोई अपने खानेके हेतु मारता है वह स्थावर योनिमें जावेगा ।

बृहस्पति—सन्तप्यते ततोऽजसं भजते च ददाति सः ।

मधुमांसनिवृत्तो यः प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥

अर्थ—जो आदमी मांस नहीं खाता, वह सर्वदा तप करता है यज्ञ और दान भी करता रहता है ।

वसिष्ठ—यावज्जीवति यो मांसं विषवत्परिवर्ज्यं येत् ।

वसिष्ठो भगवानाह स्वर्गलोकं स गच्छति ॥

अर्थ—आदमी जबतक जीवे तबतक मांस न खावे, विष जान कर त्याग दे. उसको स्वर्गकी प्राप्ति अवश्य होगी ।

जमदग्नि—यो भक्षयित्वा मांसानि स्वतश्चापि निवर्तते ।

जमदग्निर्महाहैनं सोऽपि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥

अथ—जो कोई मांस खाता हुआ स्वयं विचार कर अथवा किसीके कहनेसे मांस भक्षण छोड़ दे मृत्यु पर्यन्त न खावे, वह अवश्य स्वर्गको जावेगा ।

शुक्र—रूपमारोग्यमैश्वर्यं कान्तिं स्वर्यानमेव च ॥

प्राप्नोत्यहिंसः पुरुषः प्राहैवमुशना मुनिः ॥

अर्थ—जो हिंसा नहीं करता वह संसारमें सुन्दरता, लक्ष्मी, आरोग्यता, विद्या आदि शुभ गुणोंसे सम्पन्न होता है, मृत्युके बाद स्वर्गको जाता है ।

पराशर—सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं तथैव च ।

नोत्तमं प्राणदानाच्छ पराशरवचो यथा ॥

अर्थ—सोनादान, पृथिवीदान, गोदान ये सब श्रेष्ठ दान हैं, पर “जीवको न मारकर उसे प्राणदान देना” सबोंमें उत्कृष्ट है । यह पराशरजीका वचन है ।

इसी बातपर मार्कण्डेयजीकी भी साक्षी है —

स्वयंभू मनु—कर्मणा मनसा वाचा यो हंति न हि कश्चन ।

स मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥

अर्थ—जो कर्मसे, मनसे और वाणीसे किसी प्रकार हिंसा नहीं करता, वह सब प्राणियोंका मित्र कहलाता है ।

हत्याके दोषी—हन्ता' चैवनुमन्ता' च विश्वस्ता' 'कयविक्रयी' ।