कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंतोष बोध
( १५९ )
नीर तत्त्व जाके घट होई । ताकर आवागमन न होई ॥ नौ तत्त्वनको कह्यो विचारा । धर्मदास तुम करो सँभारा ॥ कहूँ भेद तत्त्वकी बानी । क्षत्र अधर है नाम निशानी ॥ षष्ठ कमल नैन लगि देखा । तीन भेदको कहूँ विवेका ॥ तीन भेद पुरुष तेहिके पास । छाड़े काल जीवकी आसा ॥ पुरुष शब्द हैं शीतल अंगा । तत्त्व निःअक्षर कमलके संगा ॥ आप पुरुष तेहि पिण्ड न हाथा । पुरुष बिदेहि शीश बिन गाथा ॥ कायामांहि लगी यक नाला । तहवां रहे निरंजन काला ॥ ताशिर ऊपर पांजी लागी । ताहि चढ़ि हंसा जाये आगी ॥ स्वेत औ पीत कमल है गाता । तीन तत्त्व जीव संग रहाता ॥ ताहि तत्त्वको भाव सुनाई । तीन रूप तीन महिठाई ॥ कायाक्षेत्र ताहि हम दीन्हौ । खेत कमाय सो आगम चीन्हौ ॥ सप्तपाखुरी कमल यक होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥ कमल एक लोकहै तीना । तीन लोक तीनोंपुर कीना ॥ चौथालोक अधर कहि चीन्हौ । ताकरि काल गमन नहि कीन्हौ ॥
साखी-तीनलोक विचारिके, गहे शब्द टकसार ।
कहै कबीर विचारिके, उतरो भवजलपार ॥
धर्मदास वचन चौपाई
साहेब बचन कही परमाना । तीनलोकका कहो ठिकाना ॥ चौथालोक मोहि समझाई । सुनू भेद तब मन पतिआई ॥
सतगुरु उवाच
धर्मदास मैं तोहि बुझाऊँ । तीनलोक स्थान चिन्हाऊँ ॥ ब्रह्मलोक लिंग अस्थाना । तहाँते उत्पति होय निदाना ॥ विष्णुलोक नाभी विस्तारा । शिवका लोकहै हृदय मैझारा ॥