भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ६ )

अनुरागसागर

अविचल देशको कौन पहुँच सकता है ? छन्द

बिसवास कर मनवचनको, तब चढे सतकी राहहो॥ ज्यों सूरमा रनमें धसे, फिर पाछ चितवन नाहहो॥ सती श्रूरा भाव लाखके, संत सो मग धारिये ॥ मृतके भाव विचारगुरुगम, काल कष्ट निवारिये ॥

अधिकारीकी दुर्लभता

सोरठा-कोइक, शूर जीव, जो ऐसी करनी करें ॥ ताहि मिलगो पीव, कहै, कबीर विचारिके ॥४॥

धर्मदास-वचन मृतक किये कहते हैं

मृतक भाव प्रभु कहो बुझाई । जाते मनकी तपनि नसाई ॥ केहि विधिमरत कहो यह जीवन । कहो विलोय नाथ अमृतघन ॥

कवोरवचन-मृतकके दृष्टांत

धर्मदास यह कठिन कहानी । गुरुगम ते कोइ विरले जानी ॥

भृङ्गीका दृष्टांत

मृतक होयके खोजहिं सन्ता । शब्दविचारि गहैं मगु अन्ता ॥ जैसे भृङ्ग कीटके पास । कीटहिं गहि पुरुगम परगासा ॥ शब्द घातकर महितिहि डारे । भृङ्गी शब्द कीट जो धारे ॥ तब लैगौ भृङ्गी निज गेहा । स्वाती देह कीन्हो समदेहा ॥ भृङ्गी शब्द कीट जो माना । वरण फेर आपन करजाना ॥ बिरलाकीट जो होय सुखदाई । प्रथम अवाज गहे चितलाई ॥ कोइ दूजे कोइ तीजे मानै । तनमनरहित शब्दहित जानै ॥ भृङ्गी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे रहई ॥ धर्मदास यह कीट को भेवा । यहि मति शिष्य गहे गुरुदेवा ॥