भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

( ७ )

भृङ्गीभावकी प्राप्ति कैसे होती है छन्द

भृङ्गि मति दिदृक गहे तो, करो निजसमओहि हो ॥ दुतियाभाव न चित व्यापे, सो लहे जिव मोहिहो ॥ गुरु शब्द निश्चय सत्यमाने, भृङ्गि मत तव पावई॥ तजि सकल आसा शब्द वासा, काग हंस कहावई॥

हंस कौन है ?

सोरठा-तज कागेकी चाल, सत्य शब्द गहि हंसहो॥ मुकता चुगे रसाल, पुरुष पच्छ गुरु मग गवन ॥५॥

मृतकके और दृष्टांत

सुनहु संत यह मृतक सुभाऊ । विरला जीवपीव मग धाऊ॥ औरै सुनहु मृतकका भेवा । मृतक होय सतगुरु पद सेवा॥ मृतक छोह निभाव उरधारै । छोह निभावहि जीव उबारै ॥

पृथ्वी का दृष्टांत

जस पृथ्वीके गंजन होई । चित अनुमान गहे गुणसोई॥ कोई चन्दन कोई विष्टा डारे । कोई कोई किरणी अनुसारै ॥ गुण औगुण तिन समकर जाना । महाविरोध अधिक सुखमाना॥

ऊखका दृष्टांत

औरो मृतक भाव सुनि लेहू । निरखिपरखिगुरुमगुपगु देहू ॥ जैसे ऊख किसान बनावे । रती रती कर देह कटावे ॥ कोल्हू मई पुनि आप पिरावे । पुनि कड़ाहमें आप उँटावे ॥ जिन तनु दाहे गुडू तब होई । बहुरि ताव दे खाँड विलोई॥ ताहू माहि ताव पुनि दीन्हा । चीनी तबै कहावन लीन्हा ॥ चीनी होय बहुरि तन जारा । ताते मिसरी है अनुसार ॥ मिसरीते जब कंद कहावा । कहे कवीर सबके मन भावा॥ यही विधिते जो शिष सहई । गुरु कृपा सहजे भव तरई ॥