भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 190

( ६२ )

अनुरागसागर

पुरुष प्रताप सुमिरितिहि बारा । शब्द अंगते कालहि सारा ॥ ततछण दृष्टि ताहि पर हेरा । श्यामललाट भयो तिहि केरा ॥ पंख घात जस होय पँखेरू । ऐसे काल मोहि पहाँ हेरू ॥ करे कोध कछु नाहिँ बसाई । तब पुनि परेउ चरण तर आई ॥

धर्मरायवचन छन्द

कह निरंजन सुनो ज्ञानी, करो विनती तोहिसों ॥ जान बन्धु विरोध कीन्हों, घाट भयी अब मोहिसों ॥ पुरुष सम अब तोहि जानों नहिँ दूजी भावना ॥ तुम बड़े सर्वज्ञ साहिब, क्षमा छत्र तनावना ॥ ४५ ॥ सो०—तुमहूँ करो बखशीश, पुरुष दीन्ह जसराजमुहिँ ॥ षोडशमहँ तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एकसम ॥ ४८ ॥

ज्ञानो वचन

कह ज्ञानी सुनु राय निरंजन । तुम तो भये वंशमें अज्ञन ॥ जीवन कहँ मैं आनव जाई । सत्य शब्द सत नाम हदाई ॥ पुरुष आज्ञाते हम चलि आये । भौ सागरते जीव सुत्काये ॥ पुरुष अवाज टारु यहि बारा । छनमहँ तो कहँ देउँ निकारा ॥

धर्मराय वचन

धर्मराय अस विनती ठानी । मैं सेवक द्वितीया नहिँ जानी ॥ ज्ञानी विनती एक हमारा । सो नकरहु जिहि मोर विगारा ॥ पुरुष दीन्ह जस मोंकहँ राजू । तुमहूँ देहु तो होवे काजू ॥ अब हम वचन तुम्हारो मानी । लीजो हंसा हम सो ज्ञानी ॥ विनती एक करो तुहि ताता । हट कर मानो हमरी बाता ॥ कहा तुम्हारो जीव नहिँ मानहिँ । हमरी दिशिहै बादबखानिहिँ ॥ हट फन्द हैं रचा बनायी । जामें जीव रहे उरझायी ॥ वेदशास्त्र सुमिरिति गुणनाना । पुत्री तीन देवन परधाना ॥