कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७४ )
अनुरागसागर
त्रेता युग जबही पगु धारा । मृत्युलोक कीन्हों पैसारा ॥ जीव अनेकन पूछा जाई । यमसे को तुहिं लेहिं छुड़ाई ॥ कहे भर्म वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥ विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमते मोहिं छुड़ावन हारा ॥ कोइ महेशकी आश लगावैं । कोइ चण्डी देवी गावैं ॥ कहा कहों जिव भयो विगाना । तजेउ खसमकहैंजारबिकाना ॥ कर्म कोठरी सब दिन डारा । फंदा दे सत जीवन मारा ॥ सत्य पुरुषकी आयसु पाऊँ । कालहि मेटि छोर जिवलाऊँ ॥ जोर करों तो वचन नसाई । सहजहिं जीवन लेउँ चित्ताई ॥ जो आसे जिव सेवैं ताहीं । अनचीन्है यमके सुख जाहीं ॥
विचित्र भाटकी कथा लंकामें
चहुँ दिश फिरि अयेउँ गढ़लंका । भाट विचित्र मिल्योनिःशंका ॥ तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥ सुनि विचित्र तबहिं भ्रम भागा । अति अधीनहैं चरणन लागा ॥ कहे शरण मुहिं दर्जै स्वामी । तुम सब पुरुषसमुखधामी ॥ कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजै काजू ॥ कह्यो ताहि आरति को लेखा । खेमसरिहि जस भाषेउ रेखा ॥ आनेहु भाव सहित सब साजा । आरति कीन्हशब्दधुनिगाजा ॥ तृण तोरा वीरा तिहि दीन्हा । ताके ग्रहमें काहु न चीन्हा ॥ सुमिरण ध्यान ताहि सो भाखा । पूरण डोरि गोय नहिं राखा ॥
छन्द
विचित्र वनिता गयी नृप दिग, जाय रानी सो कही ॥ इकयोगी सुन्दर है महामुनि, तासुमहिमा काकही ॥ इवैतकला अपार उत्तम, और नहिं अस देखेउँ ॥ पतिहमारे शरण गहितिहि, जन्मशुभ करिलेखेऊँ ५४