भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

( ७१ )

मधुकरवचन

कह मधुकर विनती सुन लीजै। लोकनिवास सवनकहैं दीजै ॥ यह यम देश बहुत दुख होई। जीव अम्बु बूझै नहिं कोई ॥ मोहि सब जीवनलै सुस्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी ॥ छेद-यहि देश है यममहापरवल, जीवसकलसतावई ॥ कष्ट नाना भौंति व्यापे, मरण जीवन लावई ॥ काम क्रोध कठोर तृष्णा, लोभ माया अतिबली ॥ देवमुनिगण सबहि व्यापे, कोट जीवन दलमली ५७ सो०-तिहु पुरयमको देश, जीवन कहमुखछनकहिं ॥ मेटहु काल कलेश, लेह चलहु निज देशकहैं ॥६०॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

बहुत अधीन ताहि हम जाना। करचौका तब दीन्ह परवाना ॥ षांडश जिव परवाना पाये। तिन कहैंलै सतलोक पठाये ॥ यमके दूत देख सब ठाड़े। चितवहिं तेजन ऊर्द्ध अखाड़े ॥ पहुँच जाय पुरुष दरबारा। अंशन हंसन हर्ष अपारा ॥ परसे चरण पुरुषके हंसा। जन्म मरणको मेटेउ संसा ॥ सकल हंस पूछी कुशलई। कहुद्विजकुशल भये अब आई ॥ धर्मदास यह अचरज बानी। गुप्त प्रगट चीन्हे सोई ज्ञानी ॥ हंसन अगर चीर पहिराये। देह हिरम्मर लखि सुखपाये ॥ षोडश भानु हंस उजियारा। अमृत भोजन करे अहारा ॥ अगर वासना तृप्त शरीरा। पुरुष दरशगदगद मतिधीरा ॥ यहि विधि त्रेतायुगको भावा। हंस मुक्त भये नाम प्रभावा ॥

द्रापरयुगमें करुणामय ( कबीर साहब ) के पृथ्वीपर आनेकी कथा

त्रेता गत द्रापर युग आवा। तब पुनि भयो कालपरभावा ॥ द्रापर युग प्रवेश भा जवही। पुरुष अवाज कीन्ह पुनितबही ॥

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