भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

अनुरागसागर

( ८१ )

ज्ञानीवचन

सो०—कहोधर्मसुन बात, विरल जीवमोहि चीन्हिहैं॥ शब्दनको पतियात, तुम अस कै जीवन ठगे ॥६१॥

कवीरवचन धर्मदासप्रति

अस कह मृत्युलोक पगु धारा । पुनि परमारथ शब्द पुकारा॥ छोड़यो लोक लोककी काया । नरकी देह धारि तब आया ॥ मृत्युलोकमें हम पगु धारा । जीवनसो सत शब्द पुकारा ॥ करुणामय तब नाम धराया । द्वापर युग जब महिमें आया॥ कोई न बूझे हैला मेरी । बांधे काल विषमभ्रम बेरी ॥

रानी इन्द्रमतीकी कथा

गढ़गिरिनारतबहि चलि आये । चंद्रविजय नृप तहां रहाये ॥ तेहि नृप गृहरह नारि सयानी । पूजै साधु महातम जानी ॥ चढ़ी अटारी वाट निहारे । संत दरश कहैं कायागारे ॥ रानी प्रीति बहुत हम जाना । तेहि मारग कहैं कीन्ह पयाना॥ मोहि पहुँ दृष्टि परी जब रानी । वृषली रसना कह यह बानी ॥

इन्द्रमती वचन

मारग बेगि जाहु तुम धाई । देखहु साधु आनु गहि पाई॥

दासीवचन

वृषली आय चरण लपटानी । नृप वनिता मुख भास सयानी ॥ कही वृषली रानि अस भाषा । तुम दर्शन कहैं अभिलाषा ॥ देहु दरश मोहि दीनदयाला । तुम्हरे दरश मिटे सब शाला॥

करुणामय वचन दासोप्रति

तब ज्ञानी कहि वचन सुनावें । राज रावघर हम नहिं जावें ॥ राज काज है मान बढ़ाई । हम साधू नृप गुह नहिं जाई॥

१ दासी लौड़ी