भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८२ )

अनुरागसागर

दासीवचन रानीप्रति

चली वृषली रानी पहुँ आयी । द्वै कर जोरे विनय सुनायी ॥ साधु न आवे मोर बुलाई । राज राव घर हम नहिं जाई ॥ यह सुन इन्द्रमती उठि धाई । कीन्ह दंडवत टेके पाई ॥

इन्द्रमती वचन

हे साहिब मोपर करू दाय। मोरे गृह अब धरिये पाया ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

प्रीति देख हम भवन सिधारे । राजा घर तबहीं पग धारे ॥ कहे रानी चलु मन्दिर मोरे । भयो सुखी दर्शन लिये तोरे ॥ प्रीति देखितहि भवन सिधारे । दीन्ह सिंहासन चरण खटाये ॥ दीन्ह सिंहासन चरण पखारी । चरणपरछालन अंगोछाधारी ॥ चरण धोय पुनि राखे सिरानी । पटपद पोंछ जन्मशुभ जानी ॥

इन्द्रमती वचन

पुनि प्रसादको आज्ञा मांगी । हे प्रभु मोकहँ करहु सुभागी ॥ जूठन परै मोरे गृहमाहीं । सीताप्रसाद लै हमहुँ खाहीं ॥

कृष्णामयवचन

सुनु रानी मोहि श्रुधान कोई । पंचतत्त्व पावे जेहि सोई ॥ अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥ देह हमारि तत्व गुण न्यारी । तत्वप्रकृतिहि कालरचिवारी ॥ असी पंच किहु कालसमीरा । पंच तत्वकी देह खमीरा ॥ ताहम आदि पवन इक आहीं । जीव सोहंग बोलियो ताही ॥ यह जिव अहै पुरुषको अंशा । रोकसि काल ताहि दे संशा ॥ नाना फन्द रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहि फांसै ॥ जिवतारन हम यहि जग आये । जोजिव चीन्हेताहि मुक्ताये ॥ धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेकजीव कहँ दीन्हा ॥ नीर पवनकृत्रिम किहु काला । विनशिजाय बहुकरे बिहाला ॥