कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
शब्द ध्यान तेहि दीन्ह हढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई॥ सतगुरु भक्ति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई॥ तात मात तेहि हर्ष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा॥ धर्मनि यह संसार अँधेरा । विनु परिचय जिव यमको चेरा॥ भक्ति देखि हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाईं ॥ प्रगट देखि चीन्हे नहिं मूढ़ा । परे कालके फन्द अगूढ़ा ॥ जैसे श्वान अपावन रांचेउतिमिजगअमीछोड़िविषखांचेउ नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिन पुनि कीन्ह यज्ञको साजा ॥ बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते यज्ञरचनके चित दीन्हा ॥ कृष्ण केर जब आज्ञा पाई । तब पांडव सब साज मँगाईं ॥ यज्ञकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हँकारी ॥ पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिंकाला ॥ घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञको फल तब पूरन पावे ॥ संन्यासी वैरागी झारी । आवे ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥ भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहिं जेवाईं ॥ इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घण्ट न बाजा राय लजावा ॥ जबहि घण्ट न बाज अकाशा । चकित भयोराय बुधिनाशा ॥ भोजन कीन सकल ऋषिराया । बजा न घण्ट भूप भ्रम आया ॥ पांडव तबहिं कृष्णपह गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥
युधिष्ठिर वचन
करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घण्ट नहिं बाजा ॥
कृष्ण उत्तर
कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोइ न भोजन पाया ॥
१ “शब्द ध्यान” के बदले किसी प्रतियोगी “ सुरति ध्यान ” लिखा है ।