कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
छन्द
सत्य शब्द दिदाय सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहौं ॥ छलतोर सब चिन्हाइ तवहीं, नामबल जियतारिहौं ॥ मनवचनसत्य जो मोहि चीन्ही, एकतत्त्वलौं लाइहौं ॥ तवसीस तुम्हारे पांव देहीं, अमललोक जिव आइहै ६८ सो ०-मर्दहि तोरा मान, सूरग हंस सुजान कोइ ॥ सत्यशब्द सहिदान, चीन्हहि हंसहरषअती ॥७२॥
धर्मराय वचन
कहै धर्म जीवन सुखदाई । बात एक सुहि कहो बुझाई ॥ जो जिव रहे तुम्हैं लौं आई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥ दूत हमार ताहि नहिं पावै । मूर्छित दूत मोहि पहीं आवै ॥ यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥
ज्ञानीवचन
सुनहु धर्म जो पूछेहु मोही । सो सब हाल कहो मैं तोहीं ॥ सुन धर्म तुम सत सहिदानी । सोतोसत्य शब्द आहि निर्वानी ॥ पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रकट नामसत हंस बखाना ॥ नाम हमार हंस जो गहई । भवसागर सो सो निरबहई ॥ दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥
धर्मराय वचन
कहै धर्म सुनु अन्तर्यामी । कृपा करो अब मोपर स्वामी ॥ यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥ वीरा अंक गुप्त गन आऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥ केहि कारण तुम जाहु संसारा । सोइ कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥ हमहूँ जीवन शब्द चेतायब । पुरुषलोक कहैं जीव पठायब ॥ मोहिं दास आपन कर लीजै । शब्द सार प्रभु मोकहैं दीजै ॥