भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अनुरागसागर

मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥ सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥ सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥ पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥

धर्मदास वचन

धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥ मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥ काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥

कबीर वचन

धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥ धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥ तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥ शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥ यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥

१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।