भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८६ )

विवेकसागर

दीन तब बाण राजा कर लयऊ । हित कै उग्र ज्ञान कहि दयऊ ॥ मारच्यो ज्ञान दीन तेहि बाना । हारच्यो गर्व लाग्यो विरहाना ॥ हारच्यो गर्व राजा जब जाना । तब निज गयो अपनपौ माना ॥

साखी-गर्व सुये विकल होई, चले आप रणमाहि ॥

मनही मन पछतावई, मोर कुशल अब नाहिं ॥

चौपाई

सुन्यो मोह चल्यो गलगाजी । जीतन विवेक चला दल साजी ॥ पहुँची रण अस बोलै मोहा । कहाँ विवेक आजु मम सोहा ॥ महा मोह राय मम नामा । सहो ज्ञान मोरो संग्रामा ॥ सबै उमराव गयो हरायी । अब नहिं होई तोर कुशलार्ई ॥ मैं बाण चलाओं जबहीं । क्षणमहँ होहु नाश तुम तबहीं ॥ कहै विवेक बड़का हाको । करो लडाई नाशहि ताको ॥ सुनत मोह क्रोध तब कीन्हा । धनुष उठाय कर गहि लीन्हा ॥ ममता बाण तबहीं ताना । विचित्र बाण विवेक संधाना ॥ आलस शक्ति मोह उपजाई । चैतन शक्ति विवेक चलाई ॥ अमण चक्र मोह गहि डारा । चैतन चक्र विवेक पसारा ॥ अनर्थ खड़ मोह लियऊ । अर्थ खड़ ते निरफल गयऊ ॥ निद्रा शक्ति मोह संचारी । जाग्रत शक्ति विवेक तहँ मारी ॥ मोहफांस माया विस्तारी । विवेक विचार छिनक महँ टारी ॥ उपजायो तब मोह अंधेरा । हँसे विवेक यहै बल तेरा ॥ प्रकाश बाण विवेक चलयऊ । ततक्षण अंधकार मिटि गयऊ ॥ सत्यबाण विवेक संचारा । असत खवास मोह कहँ मारा ॥ ज्ञान बाण विवेक जब छाडा । मूर्छित मोह महारथ पाडा ॥ करि विवेक मोह तज दीढी । विचल्यो मोह हृदय गौ पीढी ॥ विचल्यो मोह दशहू दिशि गयऊ । सुपथ सकल द्रन्द मिटि गयऊ ॥