कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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विवेकसागर
रखिये कि, गर्व किसीको रहा नहीं हैं इस लिये मिथ्या आशा को छोड़कर सब भाई प्रेमपूर्वक राज्य करो ।
हे धर्मदास ! शील दूतके उपर्युक्त शिक्षाप्रद वचन सुनकर मोह राजा सहित उसके सर्व समाज और सेनाभरमें कठिन क्रोधका आविर्भाव हुआ । सब चारों ओरसे लाल र आखें करके शीलको इस प्रकार देखने लगे मानो उसे नाश करनाही चाहते हैं । शीलदूतको विवेक राजाने तो समझा बुझाकर मोहको युद्धसे रोकने और सन्धि कराने के लिये भेजा था, किन्तु दूतके वचनने मोह के समाजमें उल्टाही फल प्रगट किया । जिस प्रकार जलती हुई अग्निमें घृत पडनेसे उसकी ज्वाला और भी बढ़ती है उसी प्रकार मोहकी सेनाका क्रोध अधिक बढ़ गया । मोहराजाने उसी क्रोधके आवेशमें शीलसे कहा ।
जाय कहौ निजनाथही जो उबरन चहै ॥ भागै तजि पितुराज मौनव्रत गहि रहै ॥
टीका-मोहने कहा है शील ! अपने राजा से जाकर कहो कि, यदि वह अपना कुशल चाहता है तो चुपचाप पिता (मन) के राजसे निकल कर अन्यत्र भाग जावे । अथवा यदि राज्यमें रहनाही है तो मौनव्रत धारण करके अपना कालक्षेप करले ।
मोह राजाके ऐसे गर्वित वचन को सुनकर शीलदूत विवेक राजाके पास पहुँचा ।
दूत वचन प्रति उत्तर आय सुनायउ ॥ सुनत विवेक समाज निशान बजायउ ॥
टीका-शीलने विवेक राजाके सम्मुख आकर मोह राजाके दरबारमें जो जो कुछ बीता था सब सुनाय दिया । जब विवेक-